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संसद के शीत-सत्र का ‘गर्म’ आगाज

मोदी सरकार के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से यह संसद का दूसरा सत्र है। नई लोकसभा के गठन के बाद संसद की कार्यवाही में इसके पिछले सत्र में एक बदलाव देखने को मिला था। वह बदलाव यह था कि संसद में जम कर सरकारी कार्य हुआ था अर्थात नये कानून बनाने या पुराने कानूनों में संशोधन को लेकर सरकार को ज्यादा दिक्कत पेश नहीं आयी थी। आज (सोमवार) से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष तथा संसदीय कार्यमन्त्री ने सर्वदलीय बैठकें बुला कर संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की अपील करके परंपरा निभाने का निर्वाह किया है। 

लोकसभा में सदन के नेता सामान्यतः स्वयं प्रधानमन्त्री ही होते हैं अतः उन्होंने भी विपक्ष से कहा है कि सरकार हर किसी मुद्दे और विषय पर चर्चा कराने को तैयार रहेगी अतः सदन में व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी सत्ता व विपक्ष दोनों की ही है, परन्तु संसदीय प्रणाली में सदन को सुचारू रूप से चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार अर्थात सत्ता पक्ष की ही होती है। इसका मतलब यही होता है कि सरकार को विपक्ष की चिन्ताओं को भी गंभीरता से लेते हुए उसे भी अपना मत खुल कर रखने की इजाजत देनी होती है। 

पिछले सत्र में सबसे गुणात्मक अन्तर देखने को यह मिला था कि लोकसभा के नये समझे जाने वाले अध्यक्ष श्री ओम बि​ड़ला ने सदन चलाते समय इसकी कार्यवाही में व्यवधान पैदा होने पर ‘स्थगन’ उचित नहीं समझा और सूझ-बूझ के साथ व्यवस्था कायम करने पर बल दिया जबकि दूसरी तरफ उच्च सदन कहे जाने वाले राज्यसभा में नजारा इसके विपरीत देखने को मिला। मगर निश्चित रूप से यह सदन के पीठाधीश्वरों का विशेषाधिकार होता है। 

इस पर किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी उचित नहीं मानी जा सकती। जाहिर है संसद की यह बैठक महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनाव परिणामों के बाद हो रही है और इन दोनों ही राज्यों में केन्द्र में सत्ताधारी दल भाजपा को अपेक्षानुरूप सफलता नहीं मिली है बल्कि इसके उलट विपक्षी दलों को बिना किसी प्रभावशाली चुनाव प्रचार के ही मतदाताओं ने बेहतर समर्थन दिया है जिससे स्वाभाविक रूप से विपक्ष का मनोबल भी मजबूत हुआ है, जबकि पिछला प्रथम सत्र लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत की छाया में हुआ था। 

अतः शीतसत्र में संसद की आबो-हवा में इसी के अनुरूप हमें बदलाव देखने को मिल सकता है परन्तु इससे संसद के सामने पेश होने वाले मुद्दों का खास लेना-देना नहीं है, सरकार यदि 2016 के पुराने नागरिकता ( संशोधन) विधेयक को रखने का मन बना चुकी है तो इस पर विपक्ष के रुख में परिवर्तन संभव नहीं है परन्तु संसद के भीतर विपक्षी संरचना शिवसेना द्वारा भाजपा का साथ छोड़ने के बाद जरूर थोड़ी-बहुत बदल गई है, परन्तु इसी विधेयक पर भाजपा  विपक्षी खेमे में पहुंची ‘शिवसेना’ की बांछे ढीली कर सकती है क्योंकि हिन्दुत्व का झंडा उठा कर घूमने वाली शिवसेना के इस विधेयक पर विचार विपक्षी मत के खिलाफ और सरकार के हक में हैं। 

ठीक एेसा ही मामला जम्मू-कश्मीर को लेकर भी है, हालांकि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर जब इस राज्य के पुनर्गठन का विधेयक संसद के पिछले सत्र में पारित हुआ था तो भाजपा के एक प्रमुख सहयोगी दल जनता दल (यू) ने इसका विरोध किया था, परन्तु लोकसभा व राज्यसभा की दलीय संरचना को देखते हुए इस पार्टी ने अपनी रणनीति इस प्रकार से तय की थी कि सरकार को जरा सी भी तकलीफ न हो, राजनीतिक दलों की इस पैंतरेबाजी के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार केवल 20 बैठकों वाले इस सत्र में विभिन्न राजनीतिक दलों की कार्यमन्त्रणा समिति को किस प्रकार अपने कुल 27 विधेयक पेश करने के मंसूबे पर सहमत कर पाती है और जरूरी विधेयक पारित करा पाती है। 

इन्हीं 20 बैठकों में उसे विपक्षी दलों के मुद्दों को भी जगह देनी होगी और कार्यवाही का खाका इस तरह खींचना होगा जिससे बिना किसी शोर-शराबे के दोनों पक्षों की बात आ सके। जबकि संसदीय प्रणाली की नैतिकता बा-आवाजे बुलन्द एेेलान करती है कि इस पर पहला हक विपक्ष के सांसद का ही होता है क्योंकि वह सरकार के कामों पर आम जनता के नजरिये का वकील होता है। सरकार भी उसकी बात पर तवज्जो देते हुए जरूरी कदम उठाने का वचन देती है। संसदीय प्रणाली की यही सबसे बड़ी खूबसूरती होती है जिसकी वजह से बहुमत से चुनी हुई सरकार ‘जनता की सरकार’ कहलाई जाती है। 

अतः विपक्ष का काम भी केवल आलोचना करना नहीं होता बल्कि जनता के असली दर्द और मसलों को सरकार के सामने बेखौफ होकर बयान करना होता है। इसी वजह से संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार मिले होते हैं। इन्हें खास सहूलियतों की शक्ल में देखना पूरी तरह ‘कम अक्ली’ ही नहीं बल्कि ‘बेमानी’ है। बेशक संसद किसी भी मुद्दे पर बहस- मुहाबिसे और विद्वतापूर्ण ढंग से रखे जाने वाले तार्किक दृष्टिकोण की पैमाइश के लिए बनी है जिससे सरकार की हर नीति और काम का जायजा हकीकत की रोशनी मे लिया जा सके और फिर उसी के अनुरूप फैसला भी हो सके। 

परन्तु इसका मतलब निपट शोर-शराबा और हंगामा करना भी नहीं है। इसका मतलब सिर्फ यह है कि अगर विपक्ष के तर्कों में दम है तो सरकार जनकल्याण की व्यापक दृष्टि से उन पर गंभीरता से विचार करे अपने नीतियों मे आवश्यकतानुरूप संशोधन करे क्योंकि विपक्षी सांसदों का चुनाव भी वही जनता करती है जो सत्ता पक्ष के सांसदों का करती है, किन्तु यह कार्य सत्ता और विपक्ष की जिद को छोड़ कर ही होता है, इसीलिए तो लोकतन्त्र में हार-जीत को सामान्य प्रक्रिया माना जाता है क्योंकि कोई नहीं जानता कि सत्ता और विपक्षी खेमों में बैठे राजनीतिक दलों का अगला कदम उनके पिछले कदमों का ‘नक्श’ होगा या ‘नया नक्श’ तामीर करेगा। महाराष्ट्र और हरियाणा इसकी ताजी नजीर है।