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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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सोना कितना सोहणा है...

एक तरफ कोरोना का कहर सिर चढ़ कर बोल रहा है। अर्थव्यवस्था में महामारी का माहौल है लेकिन भारतीय बाजार में पीली धातु लगातार नई ऊंचाइयां छू रही है। पहले चांदी हमेशा सोने की कीमतों के मुकाबले सस्ती रहती थी, लेकिन अब उसकी भी चमक सोने जैसी हो गई है। सोने के भाव प्रति दस ग्राम 50 हजार से ऊपर जा चुके हैं और चांदी का भाव 62 हजार से ऊपर प्रति किलो तक उछला जो अपने आप में एक रिकार्ड है। यह भाव 13 दिसम्बर, 2012 के बाद सबसे ऊंचे स्तर का है। तब एमसीएक्स पर चांदी का भाव 63,065 रुपए प्रति किलो तक जा पहुंचा था। इसी वर्ष 18 मार्च को चांदी का भाव एमसीएक्स पर 33,850 रुपए प्रतिकिलो टूटा था। उसके बाद से अब तक चांदी के भाव में 85 फीसदी के लगभग तेजी आई है।

जहां तक सोने की कीमतों में उछाल का सवाल है भारतीयों को इस धातु से काफी प्यार है। भारत आज भी सोने का सबसे बड़ा आयातक है। भारतीय महिलाएं तो सोने की खरीदारी को तरजीह देती ही हैं। भारत के धर्मस्थानों में भी सोने-चांदी के अकूत भंडार हैं। भारतीयों के लिए सोना हमेशा ही सोहणा रहा है। आम धारणा है कि संकट की घड़ी में सोना-चांदी ही काम आते हैं। भारत-पाक ​विभाजन की त्रासदी के बाद जो लाखों लोग घर-बार, व्यापार सब कुछ छोड़ कर भारत आए तब किसी के पास न रोजगार, न सिर पर छत। तब भी लोगों को सोना-चांदी ही काम आया था। तब से यह धारणा काफी पुख्ता होती गई। कभी किसी व्यक्ति की समृद्धता का आकलन इस बात से किया जाता था कि उसने अपनी बेटी की शादी में उसे कितना सोना ​िदया है। 

कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते प्रकोप के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंदी का साया मंडरा रहा है, जिसके चलते निवेशकों का रुझान शेयर,  बांड्स की बजाय हार्ड एसेट्स सोना-चांदी या रियल स्टेट्स और कच्चे तेल आदि की तरफ ज्यादा है। इनमें सोना-चांदी उनकी पहली पसंद बन गई है। कोरोना काल में मिल रही आर्थिक चुनौतियों से निपटने के ​लिए विभिन्न देशों में लाए जा रहे राहत पैकेज से सोने-चांदी में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ गई क्योंकि राहत पैकेज से महंगाई बढ़ने की आशंकाएं बनी रहती हैं, जिसके कारण निवेशकों का झुकाव सुरक्षित निवेश के साधन की तरफ जाता है। केन्द्रीय बैंकों ने जिस तरह ब्याज दरों में कटौती की, उससे बैंकों में धन रखने वालों को कोई खास रिटर्न नहीं मिल रहा। लोगों को सोने-चांदी से ज्यादा रिटर्न की उम्मीद है। सोने-चांदी में अब तक निवेशकों को अच्छा रिटर्न मिला है, जैसा भारत में 16 मार्च के बाद सोने के भाव 32 फीसदी बढ़े जबकि चांदी में 18 मार्च के बाद 86 फीसदी की तेजी आई। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका-चीन टकराव, भारत-चीन टकराव से पैदा हुई स्थितियों से निवेशकों की सुरक्षित उपकरण के प्रति रुचि बढ़ी। कोरोना काल में डालर भी लगातार लुढ़क रहा है और शेयर बाजार में अनिश्चितता का वातावरण है। मैक्सिको में कोरोना संक्रमण के फैलने से चांदी की आपूर्ति में रुकावट आने से भी इसकी कीमतों में ज्यादा तेजी आई। सोना महंगा होने की सूरत में चांदी के आभूषणों की मांग बढ़ जाती है। दरअसल चांदी को गरीबों का सोना कहा जाता है। 

सोने-चांदी की जमकर खरीदारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। सोना-चांदी में निवेश एक तरह से डैडइन्वैस्टमैंट मानी जाती है। इसका अर्थ यही है कि अर्थव्यवस्था में उत्पादक तत्व अपनी सार्थकता खो रहे हैं। अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए बाजार में धन का प्रवाह बढ़ाने की जरूरत होती है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय घरों में लगभग 25 हजार टन सोना जमा। विभिन्न मंदिरों में भी सोने की काफी मात्रा है, जिसका अनुमान लगाना कठिन है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2019-20 में लगभग 40-45 टन सोना खरीदा है। भविष्य में सोने-चांदी की कीमतों में बढ़ौतरी या कभी वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर निर्भर करती है। 

कई बाजार विश्लेषकों का कहना है कि अगले साल सोने की कीमत 65 हजार रुपए प्रति दस ग्राम तक जा सकती है। भारत में शादियों का अभिन्न अंग कहा जाने वाला सोना पारम्परिक रूप से मुद्रास्फीति के विरुद्ध बचाव के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था का सवाल है, देखना होगा कि वह किस रफ्तार से बढ़ती है। केन्द्र सरकार द्वारा लगभग हर क्षेत्र को दिए गए राहत पैकेज अर्थव्यवस्था के लिए कारगर होने की उम्मीद है। जब तक कोरोना महामारी पर काबू नहीं पाया जाता और जब तक कोई वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक दुनिया में तनाव का वातावरण रहेगा। आर्थिक गतिविधियां सामान्य होने में लम्बा समय लग सकता है। जब तक तनाव, अस्थिरता रहेगी लोगों के लिए सोना-चांदी ही सुरक्षित ​िनवेश माना जाता रहेगा। महामंदी में भी सोने-चांदी की बढ़ती चमक निवेशकों के लिए काफी जोखिम भरी भी है। अगर कोरोना का प्रकोप खत्म होते ही इन धातुओं की कीमतें ​गिरीं तो फिर उन्हें नुक्सान भी हो सकता है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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