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अफगानिस्तान में भारत की मुश्किल है डगर

युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में पिछले 18 वर्षों में एक लाख से ज्यादा आम नागरिक मारे गए या घायल हुए। इसी देश के बामियान में भगवान बुद्ध की प्रतिमायें तोड़ी गई थी। अफगानिस्तान बुद्ध से युद्ध की ओर चला गया था। 29 फरवरी को अमरीका और तालिबान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद सबसे लम्बे चले युद्ध के समाप्त होने का रास्ता साफ हो गया है। अमरीका और तालिबान में पिछले 18 महीनों में शांति समझौते पर बातचीत चल रही थी। अफगानिस्तान में शांति की जरूरत लम्बे समय से है। वहां के नागरिकों के जीवन की रक्षा करना भी जरूरी है। समझौते के तहत तालिबान अफगानिस्तान में हिंसा बंद  कर देगा और अमरीका वहां तैनात अपने सैनिकों की संख्या कम कर देगा लेकिन इस संधि के प्रति भारत के रवैये में एक बड़ा बदलाव आया है। 

कतर में जब इस संधि पर हस्ताक्षर हुए तो वहां भारतीय राजदूत पी. कुमारन भी मौजूद थे। ऐसा दो दशकों में पहली बार हुआ कि जब भारत का कोई प्रतिनिधि तालिबान के साथ एक ही कक्ष में मौजूद रहा। 2018 में मास्को में शांति वार्ता को लेकर हुई बैठक में भारत के दो पूर्व राजनयिकों को भेजा गया था। अब भारत का एक सेेवारत राजनयिक तालिबान के साथ शांति समझौते के अवसर पर मौजूद रहा। यह इस बात का संकेत है कि भारत ने इस शांति प्रक्रिया को स्वीकार कर लिया है। यह अफगानिस्तान को लेकर भारत के रुख में बड़ा बदलाव है।

 साथ ही भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अफगानिस्तान में कोई सैन्य भूमिका नहीं निभायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत और अफगानिस्तान के संबंध आज के नहीं बल्कि वर्षों पुराने हैं लेकिन भारत के रिश्ते तब खराब हुए थे जब कंधार विमान अपहरण कांड हुआ था, तब तालिबान और पाकिस्तान ने मिलकर साजिश रची थी। भारत कई वर्षों से युद्ध के कारण जर्जर हुए अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए हर तरह की मदद करता आया है। भारत का शुरू से ही मानना है कि वहां राजनीतिक प्रक्रिया का नेतृत्व अफगान मुख्यधारा के लोग ही करें। जब अमरीका ने गुड तालिबान और बैड तालिबान की बात शुरू की थी तो भारत ने इसका विरोध किया था।

अब सवाल यह है कि भारत ने इस शांति संधि का समर्थन क्यों किया? इसका उत्तर यही है कि भारत के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। भारत ने अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचे पर तीन अरब डालर खर्च किए हैं। अगर यह सब खत्म हो गया तो फिर भारत को काफी नुक्सान उठाना पड़ सकता है। भारत ने यह फैसला अफगानिस्तान में किए गए अपने निवेश को बचाने के लिए ही किया है। भारत की सहमति में सीधे अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भी भूमिका है। उन्होंने हाल ही में भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अफगानिस्तान मुद्दे पर बातचीत भी की थी। पिछली तीन शताब्दी में ऐसा तीसरी बार हो रहा है कि किसी महाशक्ति को अफगानिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

 18वीं शताब्दी में ब्रिटेन को अफगानिस्तान से हटना पड़ा था। 19वीं शताब्दी में महाशक्ति सोवियत संघ ने 1979 में अफगानिस्तान में प्रवेश किया था लेकिन उसे काफी नुक्सान उठाना पड़ा था और फरवरी 1989 में अफगानिस्तान से भागना पड़ा था। इसके बाद अलकायदा के आतंकियों ने 11 सितम्बर 2001 को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सैन्टर और पेंटागन पर हमला किया था। इसके बाद अमरीका ने अलकायदा प्रमुख लादेन से बदला लेने के लिए अफगानिस्तान पर हमला कर दिया था। अमरीका ने अफगानिस्तान में जंग पर 750 अरब डालर से ज्यादा खर्च किए। उसके 2400 से ज्यादा सैनिकों की मौत हुई। अब सवाल यह है कि क्या यह समझौता भारतीय हितों के अनुकूल है या नहीं। हो सकता है कि तालिबान से अमरीकी समझौता भारत को भारी पड़े। तालिबान के रिश्ते पा​किस्तान से काफी गहरे हैं।  हो सकता है कि तालिबानी आतंकी अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर कश्मीर की ओर रुख करें। 

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि  अफगानिस्तान में बाहर से प्रायोजित आतंकवाद बंद होना चाहिए। उसका इशारा पाकिस्तान की तरफ ही था। डोनाल्ड ट्रंप के लिए शांति समझौता बहुत अहम है। अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव इसी वर्ष होने वाले हैं। ट्रंप ने वादा किया था कि वह अमरीकी सैनिकों को वापस बुलायेंगे। ट्रंप तो अपनी योजना पूरी कर गए लेकिन भारत की चिन्ता यह है कि तालिबान पाकिस्तान के ज्यादा नजदीक है और पाकिस्तान अफगानिस्तान में आतंकी प्रशिक्षण ​शिविर लगाता रहा है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी हक्कानी गुट का समर्थन करता रहा। तालिबान के उदय में भी अमरीका की भूमिका रही है। अमरीका ने सोवियत संघ की फौजों को खदेड़ने के लिए  ही ता​िलबान को धन और हथियार उपलब्ध कराये थे। अब देखना यह है कि  भारत अपने हितों की रक्षा कैसे करता है। अमरीका ने अपने हित तो साध लिए। अब देखना होगा कि ट्रंप अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी पर क्या स्टैंड लेता है  और तालिबान भारत के प्रति क्या रुख अपनाता है क्योंकि पाकिस्तान वहां भारत की मौजूदगी नहीं चाहता।