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ड्रेगन के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय मोर्चाबंदी जरूरी

भारत और चीन के बीच जारी नौ महीने के गतिरोध के बाद लद्दाख स्थित पैगोंग झील के उत्तर दक्षिण तट पर दोनों देशों के सैनिकों को हटाने पर बनी सहमति के बाद हर भारतीय ने राहत की सांस ली है। क्योंकि इस बात की आशंका थी कि दो बड़े देशों का टकराव विश्वव्यापी संकट को जन्म दे सकता था। यह एक अच्छा कदम है क्योंकि भारत ने ड्रैगन की आंख में आंख डालकर बात की और दोनों देशों की सेना अपने स्तर पर खुद ही समझौते का अनुसरण कर रही हैं। चीन पीछे हटने को तैयार इसलिए हुआ क्योंकि भारत की सेना ने पूर्वी लद्दाख और कैलाश पर्वत के आसपास के ऊंची पहाड़ी इलाकों पर मोर्चे सम्भाले हुए हैं। ऊंची पहाड़ियों पर भारत की मोर्चाबंदी से चीन को बहुत परेशानी हो रही थी। वैसे भी इस इलाके की भौगोलिक परिस्थिति और मौसम में अपने सैनिकों को ढालना चीन के लिए मुश्किल हो रहा था। उसके सैनिकों को बर्फ में डटे रहने का अनुभव नहीं था, इसलिए पीछे हटना उसकी मजबूरी थी। 

भारत ने जिस तरीके से अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया उससे चीन भी हैरान है। उसने डोकलाम से पूर्वी लद्दाख तक में भारत के कड़े प्रतिरोध की कल्पना भी नहीं की थी। अभी भी भारत को पूरी तरह सतर्क रहने की जरूरत है। सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा है कि चीन के रवैये के कारण भारत का भरोसा टूटा है। आज का भारत ड्रैगन की हर चाल का मुंह तोड़ जवाब देने में सक्षम है। हमें यह भी देखना होगा कि भारत को चारों तरफ से घेरने की मंशा पाले चीन भारत के पड़ोसी देशों म्यांमार, नेपाल और भूटान में क्या कर रहा है। भूटान ने चीन से बचकर सावधानीपूर्वक कदम उठा रहा है और बंगलादेश के साथ भारत के साथ मजबूत संबंध हैं। म्यांमार आैर नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल के लिए चीन पूरी तरह से जिम्मेदार है। म्यांमार, नेपाल में चीनी हस्तक्षेप का असर भारत के पूर्वोत्तर पर पड़ रहा है और भारतीय सेना को सतर्क रहना होगा।

चीन ने जिस तरीके से म्यांमार के सैन्य तानाशाह जनरल मिव आंग हिलिंग का समर्थन किया उससे म्यांमार में चीन विरोधी भावनाएं जोर पकड़ने लगी हैं। लोगों का मानना है कि चीन ही असली अपराधी है, वह शांतिप्रिय देश के जीवन में अशांति पैदा कर रहा है। उसने सेना को लोकतंत्र को दांव पर लगाने के लिए मजबूर किया है। चीन के खिलाफ म्यांमार की जनता सड़कों पर है। म्यांमार के लोगों ने लोकतंत्र के लिए नोबल पुरस्कार विजेता सू की के नेतृत्व में लम्बा संघर्ष किया है, लेकिन सेना ने 2020 के चुनावों में धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए नेशनल लीग आफ डेमोक्रेसी की लोकतांत्रिक एप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फैंका। चीन को म्यांमार में सैनिक शासन इसलिए पसंद है क्योंकि उसने म्यांमार में काफी निवेश कर रखा है और वह सैनिक शासन के ​जरिये अपनी विस्तारवादी नीतियां लागू करना चाहता है। नेपाल की राजनीति में चीन के बढ़ते दखल के विरोध में वहां की जनता भी सड़कों पर है।

नेपाल के नेता भले ही कितनी भी बयानबाजी करें, लेकिन मुश्किल वक्त में उन्हें भारत याद आता है। अब पुण्य कमल दहल उर्फ प्रचंड ने भारत से मदद की गुहार लगाई है। दरअसल  प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली द्वारा संसद भंग करने को लेकर नेपाल की सियासत में भूचाल आया है। प्रचंड ने इस फैसले को असंवैधानिक और अलोकतां​ित्रक करार दिया है। अब वह चाहते हैं कि भारत सहित अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर उसकी सहायता करे। नेपाल की जनता चीन के षड्यंत्रों कोे समझ चुकी है। के.पी. शर्मा ओली चीन समर्थक हैं। चीन ने ओली और प्रचंड में सुलह कराने की कोशिश की थी लेकिन वह कामयाब नहीं हुआ।

म्यांमार का घटनाक्रम कोई मामूली घटनाक्रम नहीं है। राजधानी नेप्यीता, यांगून और मांडले सहित देश के प्रमुख शहरों में बौद्ध भिक्षु, पुलिस, डाक्टर और आम जनता प्रदर्शन कर रही है, उससे स्पष्ट है कि सेना की सरकार को घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ेगा। 

अमेरिका और कई देशों ने तख्ता पलट पर म्यांमार पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, अरबों डालर की मदद रोक दी है। हांगकांग को लेकर भी चीन बुरी तरह से फंसा हुआ है। चीन को वहां लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है। हांगकांग को लेकर अमेरिका और चीन में टकराव बढ़ता ही जा रहा है। हांगकांग एक स्वायत्त क्षेत्र है तथा इसकी शासन व्यवस्था चीन से भिन्न है। चीन द्वारा हांगकांग प्रत्यर्पण कानून में लाए जा रहे बदलाव लोगों को स्वीकार्य नहीं हैं। चीन वहां खुलेआम दमनचक्र चला रहा है। दक्षिण चीन सागर में भी चीन ने अपनी दादागिरी के चलते कई दुश्मन खड़े कर लिए हैं। आज अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत चीन की दादागिरी का विरोध कर रहा है। चीन अपनी करतूतों के चलते इतना बौखला गया है कि उसने खबरों को दबाने के लिए बीबीसी के चीन में प्रसारण को प्रतिबन्धित कर दिया है।

चीन का आरोप है कि बीबीसी की कोरोना वायरस महामारी और शि​वजियांग में उईधर के शोषण पर पक्षपातपूर्ण रिपो​र्टिंग कर रहा है। दरअसल चीन जिस तरह से लोगों को बेरहमी से मार रहा है, इसे वह छिपाना चाहता है। अब उसे टुकड़ों-टुकड़ों में हर जगह हार मिल रही है, इससे वह अपनी सुधबुध खो बैठा है। बड़े राष्ट्र तो चीन को घेर लेंगे लेकिन सवाल यह भी है कि ड्रैगन से छोटे देशों को कैसे बचाया जाए। चीन की अन्तर्राष्ट्रीय छवि धूर्त्त राष्ट्र की बन चुकी है। कोई देश उस पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। चीन की गुंडागर्दी रोकने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया की जरूरत है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाहों का अंत हुआ है। चीन के जुर्म हद से बढ़ने लगे हैं तो प्रतिक्रिया भी होगी। इससे पहले कि चीन दुनिया में अशांति पैदा कर दे, सभी को एकजुट होकर चीन को मात देनी होगी।