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जेएनयू में जांच की गति!

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में विगत 5 जनवरी को कुछ नकाबपोशों द्वारा की गई बर्बर हिंसा की जांच कर रही दिल्ली पुलिस ने जिस तरह तथ्यों की छानबीन की है उससे उसकी विश्वसनीयता और ईमानदारी पर बहुत बड़ा सवालिया निशान इसलिए लग गया है क्योंकि इसकी तफतीश विश्वविद्यालय प्रशासन की आन्तरिक व्यवस्था के पेंचोखम को ही खंगाल रही है और छात्र संघ व विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच चली आ रही तनातनी को ही जांच का केन्द्र बनाना चाहती है। 

हकीकत यह है कि भारत के प्रत्येक विश्वविद्यालय में छात्र संघ जब अपनी कुछ मांगों के लिए आन्दोलन चलाता है तो प्रशासन के साथ उसका टकराव होता है और ऐसे मामलों को विश्वविद्यालय स्वयं सुलझाता है क्योंकि वह जानता है कि जवानी के जोश में छात्र कुछ ऐसी हरकतें कर सकते हैं जिनसे सामान्य गतिविधियां प्रभावित हों। छात्रों को अनुशासन में रहते हुए अपना आन्दोलन चलाने के लिए विश्वविद्यालय का चीफ प्रोक्टर ही मजबूर करता है और वह अनुशासन का डंडा चला कर छात्रों को इस तरह संयमित करता है जिससे जवानी के जोश में किसी भी छात्र का भविष्य खराब न होने पाये। 

प्रत्येक विश्वविद्यालय का यह अलिखित सिद्धान्त होता है कि अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों का प्रयोग करते समय कोई भी छात्र अपराध प्रवृत्ति की तरफ न बढ़ पाये। अतः विश्वविद्यालय परिसर के भीतर हुए गैर मुनासिब या कभी-कभी कानून तोड़ने तक जैसे मामलों को भी प्रशासन स्वयं ही निपटाता है परन्तु जेएनयू के मामले में हमें अच्छी तरह समझना होगा कि 5 जनवरी से पूर्व विश्वविद्यालय परिसर में आन्दोलनकारी छात्रों व प्रशासन के बीच जो कुछ भी हो रहा था और जिस तरह से भी छात्र अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रशासन पर दबाव बना रहे थे वह पूरी तरह विश्वविद्यालय के आन्तरिक प्रशासन क्षेत्र का मामला था। 

विश्वविद्यालय के इंटरनेट सर्वर को क्षति पहुंचाने से लेकर बढ़ी हुई फीस देकर नये सत्र के लिए कुछ छात्रों का पंजीकरण कराना और उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए आन्दोलनकारी छात्रों की कार्रवाइयां छात्र राजनीति का ऐसा अंग होती हैं जिनका मुजाहिरा प्रायः हर विश्वविद्यालय में किसी आन्दोलनकाल में होता रहता है। अतः पुलिस की जांच का काम इन घटनाओं से शुरू करना बताता है कि जेएनयू प्रशासन किस कदर नाकारा और नाकाबिल है। अतः देश के पूर्व शिक्षा मन्त्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी का यह कहना सर्वथा उचित और तर्कपूर्ण है कि जेएनयू के कुलपति एम. जगदीश कुमार को उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए। 

पुलिस ने अपनी जांच उसी सूत्र को पकड़ कर शुरू की है जो माननीय जगदीश कुमार ने उसे पकड़ाया। जगदीश कुमार का कहना था कि 5 जनवरी की हिंसा के तार उससे पहले हुई घटनाओं से जुड़े हुए हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि ये कैसी घटनाएं थीं जिसकी वजह से 5 जनवरी की शाम को कुछ नकाबपोश पुलिस की मौजूदगी में विश्वविद्यालय परिसर में घुसकर तीन घंटे तक हिंसा करते हैं। छात्र संघ की अध्यक्ष आयशी घोष का ही सिर फोड़ देते हैं और शिक्षकों समेत 34 छात्रों को घायल कर देते हैं और शिक्षकों के आवास को भी अपना निशाना बनाते हैं? जिस आयशी पर कातिलाना हमला हुआ है और अन्य छात्रों से भी इसी तरह पेश आया गया है, क्या उसका सम्बन्ध किसी ऐसी घटना से हो सकता है जो आन्दोलन की वजह से उपजी हो? 

लेकिन पुलिस ने अपनी पहली जांच में आयशी को ही मुल्जिम बना कर पेश कर दिया है। यह सवाल अभी तक दबे तरीके से उठाया जा रहा है कि आयशी एक महिला है और उस पर कातिलाना हमला हमलावर के जुर्म को दोगुणा कर देता है मगर अजीब समां बांधा जा रहा है कि उसे ही कुछ लाठी-डंडों से लैस लोगों की अगुवाई करते दिखाया जा रहा है।आजकल वीडियो के प्रचार युद्ध में सोशल मीडिया पर ‘फेक वीडियो’ यानि फर्जी वीडियो या जोड़तोड़ करके बनाई गई वीडियो का कारोबार जिस तरह चल रहा है उसने किसी भी जांच एजेंसी के काम को और ज्यादा मुश्किल बना दिया है और सही-गलत का अन्दाजा करना भारी जोखिम भरा होता जा रहा है परन्तु पुलिस ने इन्हीं सोशल मीडिया पर जारी वीडियो से निष्कर्ष निकालने में देरी नहीं की जबकि इसके उलट एक निजी चैनल ने अपनी खोज में एक-दो नकाबपोशों को प्रकट कर दिया। 

जिन्होंने 5 जनवरी की शाम को जेएनयू में गुंडागर्दी की सारी हदें पार कर दी थीं। यह चैनल खुलेआम ऐलान कर रहा है कि उसकी वीडियो दिल्ली पुलिस ले ले और जांच करे मगर मुख्य सवाल यह है कि क्या दिल्ली पुलिस को इस कांड की जांच करने का अधिकार दिया जा सकता है जबकि चैनल की वीडियो में नकाबपोश बन कर जुल्म बरपाने वाला एक छात्र स्वयं कह रहा है कि उसने यह कार्य पुलिस की मौजूदगी में ही किया और एक पुलिस अफसर ने उसे अपना काम करने की छूट भी दी। पुलिस का असली काम तो इसी विनाश लीला की जांच करने का था और वह स्वयं ही इसमें संलिप्त है तो फिर जांच वह किस हैसियत से कर सकती है? मगर इससे भी ऊपर वह वीडियो भी आ चुकी है जिसमें नकाबपोश बड़े आराम से पुलिस की मौजूदगी में ही विश्वविद्यालय परिसर से ससम्मान बाहर जा रहे हैं। 

इस वीडियो के बारे में पुलिस का क्या ख्याल है? मगर इसका मतलब यह कदापि न निकाला जाये कि मैं पुलिस के खिलाफ हूं बल्कि इसका मतलब यह जरूर निकाला जाना चाहिए कि मैं उस व्यवस्था के खिलाफ हूं जिसमें पुलिस को संविधान की जगह शासन का दास बनाया जा रहा है। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि 1984 के सिख दंगे के बाद से पुलिस के चरित्र को लांछित करने का योजनाबद्ध कार्यक्रम राजनैतिक दलों ने चलाया है जबकि पुलिस केवल संविधान की ही दास होती है क्योंकि भारत की बहुदलीय राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्था में राजनैतिक हुक्मरान अदलते-बदलते रहते हैं। 

स्वतन्त्र भारत में जो पुलिस प्रशासनिक व्यवस्था प्रथम गृहमन्त्री सरदार पटेल ने स्थापित की थी उसमें पुलिस को कानून का गुलाम होकर उसका राज स्थापित करने का अधिकार राजनैतिक नेतृत्व में दिया गया था क्योंकि राजनैतिक नेतृत्व स्वयं संविधान की शपथ लेकर शासन चलाने से बन्धा होता है। अतः जेएनयू कांड में सिर्फ वही होना चाहिए जो कानून कहता है। आयशी और जगदीश क्या कहते हैं इसके कोई मायने नहीं हैं। छात्रों  को छात्र हित में आन्दोलन चलाने का अधिकार है तो विश्वविद्यालय प्रशासन को परिसर में अनुशासन कायम रखने का और पुलिस को हिंसा की जांच करने का मगर इसे अपने सामने होते देखने का नहीं।

-आदित्य नारायण चोपड़ा