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संपादकीय

It’s My Life (38)

मैंने अपने पिताजी के बारे में तो सब कुछ बता दिया। पिताजी मुझे इस कदर प्यार करते थे कि काश वो जिन्दा होते तो मेरे साथ अमेरिका में कैंसर के इलाज के वक्त पूरा समय साथ होते। मुझे याद है जब मैं 6-7 साल का था तो सर्दियों में सुबह-सुबह स्कूल जाने के लिए उठना पड़ता था। मेरे पिताजी अपने दोनों हाथों को रगड़ते हुए अपने हाथों में गरमाईश पैदा कर मेरे गालों पर रखते और गुरुग्रंथ साहिब के दो शब्द गुनगुनाते।

‘मेरे राम राय तूं संता का संत तेरे,

धन गुरु नानक प्रगटया, मिट्टी धुंध-जग चानन होया’।

बड़े प्यार से उठाते और स्कूल जाने के लिए मुझे सुबह-सुबह अमृतवाणी सुनने को मिलती। दूसरे हर शनिवार और रविवार मैं पिताजी के साथ साइकिल के डंडे पर आगे बैठता, पीछे साइकिल पर पिताजी अखबार का बंडल रखते और रेलवे रोड के मोड़ पर हम दोनों बाप-बेटा जमीन पर बैठ कर अखबार बेचा करते। दिल्ली में 1982 में जब पंजाब केसरी दिल्ली की शुरूआत मैंने की तो दिल्ली के विभिन्न सैंटरों पर जमीन पर खुद बैठकर अपनी अखबार को कितने ही वर्ष बेचता रहा।

मेरे और मेरे पिता के पीछे चार शक्तियां थीं- मेरे दादा लाला जगत नारायण जी, मेरी परदादी, दादी शांति देवी और मेरी मां श्रीमती सुदर्शन चोपड़ा जो मेरे लिए दुनिया की सबसे सुन्दर ज्ञान की भंडार, ममतामयी, त्याग की मूर्ति है। मेरी मां ने मुझे पालने में बहुत मेहनत की। घर बहुत बड़ा, परिवार की तीन पीढ़ियां इकट्ठीं और एक किचन। मैंने छोटे होने से अपनी मां और चाची को हमेशा घर सम्भालते, काम करते देखा। मेरे चाचा मेरे चाचा कम मेरे मास्टर और मेरे दाेस्त थे। मुझे अपने चाचा-चाची और सारी बुआओं से बहुत स्नेह मिला। मैं सबका लाडला और शरारती बच्चा था। मुझे एक वाक्य कभी नहीं भूलता कि अक्सर मैं शरारत करता था और मुझे लाइन वाइज यानी पहले चाचा फिर पिता, फिर दादा से मार पड़ती और बचाने वाली मेरी दादी होती थी। एक बार मुझे कुत्ते ने काट लिया। जब मैं रोता-रोता घर आया तो सबसे पहले मुझे चाचा ने मारा, फिर पिताजी, फिर दादाजी ने बाद में उन्होंने पूछा कि क्या हुआ। 

फिर मेरे चाचा और पिता मुझे मोटरसाइकिल पर बिठाकर अस्पताल ले गए तथा कुत्ते के काटने वाले बड़े-बड़े इंजैक्शन लगवाए गए। किरण से शादी करवाने में भी मेरे चाचा और मेरी बुआ स्वर्ण सूरी का बहुत सहयोग था। चाचा को अपने पुत्र मोह ने मुझसे दूर कर दिया वरना चाचा मेरे लिए पिता से आगे थे। अपने पिता से हमें कम समय तथा कम प्यार मिला परन्तु चाचा एक दोस्त और एक मार्गदर्शक थे, ​स्ट्रिक्ट थे परन्तु  प्यार था, कोई मेरा-तेरा नहीं था। जब तक लाला जी, रमेश जी रहे हमारा सारा परिवार एक माला में पिरोया हुआ था। किरण के लिए पापा, चाचा, मम्मी, आंटी एक ही थे। वह दोनों के लिए साड़ियां पेंट करती थी, एक जैसा समान खरीदती थीं। उसके माता-पिता ने भी उन दोनों में कोई फर्क नहीं​ किया। किरण की मां खाना बड़ा अच्छा बनाती थीं। लगभग हर शनिवार को हमारा सारा परिवार उनके घर उनके हाथ के खाने का स्वाद लेता था और वो लाला जी, रमेश जी, चाचा जी और मम्मी, आंटी को देखकर इतनी खुश होती थीं और कहती थीं ‘की​ड़ी घर भगवान आए।’

मैं जब भी कोई गलती करता तो अपनी छत पर जाकर छुप जाता और अपने बहन-भाइयों को कहता कि बताना नहीं। और जब पापा, चाचा पूछते वो बताते नहीं थे परन्तु सब ऊपर छत की तरफ मासूमों की तरह देखते और पापा, चाचा को पता चल जाता कि मैं कहां हूं। हम बहन-भाइयों में सबमें बहुत प्यार था, कोई फर्क नहीं था। एक बार मेरा भाई छोटू (चाचा का बेटा) और किरण घर से गए कालेज के लिए परन्तु पहुंचे ही नहीं, सबको ​फिक्र हो गई। बाद में 4 घंटे बाद दोनों वापस आए तो पता चला कि वे किरण की मां के घर पकौड़े-चाय का आनंद ले रहे थे। किरण का अपने देवरों-ननदों से बहुत प्यार था। हमारी फैमिली की लोग मिसाल देते थे। मुझे क्रिकेट का इतना शौक था कि मैं ग्राउंड में क्रिकेट खेलने भाग जाता और मेरी मां मुझे रिक्शा में बैठ कर ढूंढने आती। मेरी मां की आवाज बहुत अच्छी थी, वह अक्सर गीता दत्त के गाने गातीं। आज भी मुझे उनकी बचपन की लोरी बहुत याद आती है और जब मैं अमेरिका में था मुझे आईसीयू में पहले होश आया तो मैंने किरण को कहा, मुझे मां की लोरी सुननी है, फोन मिलाओ और वो 87 की हो गईं, उन्हें याद ही नहीं आ रही थी।

मुझे आज भी याद है जब मुझे स्कूल में बहुत सारे ईनाम मिलते तो मेरी मां और मेरी सबसे बड़ी बुआ संतोष सुरपाल खुशी से फूली नहीं समाती थीं। मुझे इतना प्यार मिला कि मैं बयान नहीं कर सकता। मेरी दादी, मां, चाची और बाद में किरण को भी घर की अखबार की रद्दी से ही पॉकेट मनी बनती थी, सब उसी से आगे बढ़ीं। जब मेरा बेटा आदित्य हुआ तो वह ज्यादा मेरी मां-चाची के पास होता था, वह सोता नहीं था तो उसके चाचू कालू और छोटू उसे अपनी छाती पर रखकर सुलाते थे। मेरे पिता जी अक्सर उसे दिल्ली से अपने साथ ले जाते, उसने भी सबसे बहुत प्यार लिया परन्तु समय बदला, परिवार खंडित हो गया, रिश्तों की मर्यादाएं टूट गईं। सारी संवेदनाएं खत्म हो गईं और घर का प्यार घर की दीवारों में दब गया। 

मैंने अमरीका के अस्पताल के ICU बैड से किरण जी को अपने मोबाइल पर माता जी से बात करवाने को कहा। क्योंकि हमने अमेरिका जाने से पहले आशीर्वाद तो लिया पर उनको बताया नहीं क्योंकि हमने संगीता जेटली से सलाह की थी तो उन्होंने कहा कि आकर बता देना। वह इस उम्र में सहन नहीं कर पायेगी। किरण ने माता जी का मोबाइल मिलाया और कहा ‘‘मम्मा आपका बेटा अश्विनी अमरीका के अस्पताल के ICU में जीवन-मौत से लड़ रहा है, एक बार बात कर लो’’

फिर मैंने फोन पकड़ा (फोन की बातचीत जैसे की जैसी पेश कर रहा हूं)

अश्विनी- माताजी, मैं अब भगवान के पास अपने दादा और पिताजी से मिलने जा रहा हूं। मरने से पहले मुझे वो ‘लोरी’ तो सुना दो जो बचपन में मुझे सुलाने के लिए सुनाया करती थीं।’’

माताजी- बोल कौन सी लोरी?

अश्विनी- आप को याद नहीं?

माताजी- नहीं, मुझे याद नहीं।

अश्विनी- अच्छा मुझे 60 वर्ष बाद भी याद है। 

माताजी- अच्छा, तू बता?

अश्विनी- ‘‘नन्हीं कली सोने चली, हवा धीरे आना’’

माताजी- हां याद आ गई। 

अश्विनी- माताजी मैं कभी आप की गोद में तीन वर्ष का इस लोरी से सोया करता था अब आप की वही  :

‘‘नन्हीं कली सदा के लिए सोने जा रही है, इसलिए हवा धीरे आना’’

मैंने माताजी से यह लोरी सुनी और बहुत सुखद अनुभव हुआ। लगा कि अब मैं अपनी मां से बात करने के बाद आराम से मर सकूंगा। बचपन में मेरी मां मुझे प्यार से नन्हीं कली कह कर पुकारा करती थी और जब मैं सोता नहीं था तो यही लोरी गाकर और सुन कर मुझे नींद आती थी। अब मेरी मां 87 वर्ष की हो गई हैं उन्हें कुछ समझ नहीं आता। सब कुछ भूल जाती हैं। जो मां मेरे हल्के कान दर्द में सारी रात जागती थी आज मैं इतनी भयंकर बीमारी से ग्रस्त हूं तो वह बेखबर है। मैं उनसे नाराज नहीं क्योंकि उनकी उम्र है परन्तु उनके प्यार की कमी जरूर होती है। मां तो मां होती है और उसका स्थान कोई नहीं ले सकता। फिर भी वरिष्ठ नागरिक की कई माएं मुझे भरपूर प्यार देती हैं, आशीर्वाद देती हैं। मां का महत्व एक बेटे की जिंदगी में क्या होता है और मां और बेटे का प्यार और आशीर्वाद का रिश्ता कैसा होता है? मैं एक छोटी सी कहानी में बताना चाहता हूं।

एक युवा लड़का एक सुन्दर लड़की से प्रेम करता था और उस लड़की से शादी भी रचाना चाहता था। लड़की ने शर्त रखी कि अगर तुम अपनी मां का कलेजा लाकर दोगे तो तुमसे शादी कर लूंगी। लड़का झट घर गया और मां को मारकर उसका जिंदा कलेजा लेकर अपनी प्रेयसी को भेंट करने के लिए दौड़ पड़ा। रास्ते में उसे ठोकर लगी और मां का कलेजा हाथ से फिसला और छिटक कर दूर जा गिरा। मां के जिन्दा कलेजे ने अपने पुत्र से पूछा- बेटा तुझे चोट तो नहीं लगी। मैंने यह कहानी किरण और अपने दोनों बेटों अर्जुन और आकाश को सुनाई। कहानी सुनाते मेरी आंखों में आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। मैं लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा। डाक्टरों और नर्सों ने मुझे  घेर लिया लेकिन इससे पहले कि डाक्टर-नर्स और किरण मुझसे फोन छीन लेते मैं अपनी मां से बोला :-

अश्विनी- अच्छा मां जी अब मैं बचूंगा नहीं- नमस्कार जननी, मुझे इस दुनिया में लाने वाली मेरी मां, धन्यवाद, अब मैं आखिरी सांसें ले रहा हूं। मरने का इन्तजार कर रहा हूं। इस मौके पर तो कुछ आशीर्वाद दे दो। माताजी ने मुझे आशीर्वाद दिया और मैं संतुष्ट होकर फिर से बेहोश हो गया। बाद में जब होश आया तो मुझे एक अंग्रेज लेखक की पंक्तियां याद आईं-

Even if you are sick and become a patient you must never lost patience. जिन लोगों ने मेरी बीमारी पर मेरे और मेरे बच्चों तथा पत्नी पर कोर्ट केस डाले थे उनके बारे में सोचा तो यह ख्याल आया कि ‘If a man loses its moral values, he loses eveything’.

फिर ये भजन अमरीका के हस्पताल में याद बार-बार आता थाः-

हे सांई मैं तेरे द्वारे पर आया हूं, सब संगी-साथी छूट गए।

सब मां-बंधु साथ छोड़ गए, अब तेरा ही सहारा है

तुम भी मुझे ठुकराना न, वर्ना मैं कहीं का न रहूंगा। 

कैंसर अस्पताल में पड़े बार-बार यह गाना गुनगुनाता था-

‘सब कुछ सीखा हमने

न सीखी हाेशियारी

सच है दुनिया वालो

कि हम हैं अनाड़ी’। 

कैंसर रोग से ग्रसित बचपन में Robert Frost की यह कविता भी बहुत पसंद है मुझे जिसे मैं अमरीका के अस्पताल में गुनगनाता रहता था-

The Woods are Lovely, 

Dark and Deep,

But I have Promises to keep

And miles to go before I sleep 

And miles to go before I Sleep.