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यह बात 1977 की है, जब शेख अब्दुल्ला ने जालन्धर से प्रकाशित हमारे उर्दू के हिन्द समाचार और हिन्दी के पंजाब केसरी अखबारों पर जम्मू-कश्मीर में प्रवेश पर पाबन्दी लगा दी थी। लालाजी और रमेशजी उम्रभर अंग्रेजों से लड़ते रहे भारत की आजादी के लिए, फिर पं. नेहरू की तानाशाही के विरुद्ध, प्रताप सिंह कैरों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध, इंदिरा गांधी की एमरजैंसी के ​विरुद्ध तो जेल में भी जाना पड़ा। 15 अगस्त 1947 में भारत अंग्रेजों की दासता से पूर्ण रूप से मुक्त हुआ। लालाजी ने अंग्रेजों के राज में 16 वर्ष जेल में गुजारे। इंदिरा के राज में एमरजैंसी के दौरान 1975 से 1977 तक 2 वर्ष जेल में रहे लेकिन सबसे हैरानी की बात यह रही कि 26 अगस्त 1947 के दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास में उस समय की पंजाब प्रदेश कांग्रेस के महासचिव लालाजी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें स्वतंत्र भारत में जेल हुई। 

असल में 18 अगस्त 1947 को जब पूज्य दादाजी और पिताजी परिवार के साथ लाहौर छोड़कर पहले करतारपुर और फिर जालन्धर आए तो पूरे पंजाब में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के रिलीफ कैंप चल रहे थे। होशियारपुर से कुछ शरणार्थी जालन्धर लालाजी से मिलने आए तो उन्होंने होशियारपुर में चल रहे शरणार्थी कैंप में स्थानीय प्रशासन द्वारा ठीक ढंग से संचालन न करने की शिकायत की। प्रदेश कांग्रेस के सबसे प्रमुख नेता के रूप में लालाजी होशियारपुर दौरे पर गए और उन्होंने प्रशासन द्वारा पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के साथ बदसलूकी के चलते उनकी दयनीय हालत देखी। लालाजी ने होशियारपुर के ​डिप्टी कमिश्नर से मीटिंग की और शरणार्थी कैंपों की दुर्दशा के बारे  में उन्हें बताया लेकिन डिप्टी कमिश्नर ने लालाजी की परवाह नहीं की। इस पर लालाजी होशियारपुर के शरणार्थी कैंप में सत्याग्रह पर बैठ गए। 

आखिर बात इस कदर बढ़ गई कि होशियारपुर के ​डिप्टी कमिश्नर ने लालाजी को पकड़ कर जेल में डाल दिया। लालाजी दस दिन जेल में रहे और जब तक केन्द्र से शरणार्थियों की व्यवस्था ठीक नहीं हुई लालाजी जेल में ही रहे। दसवें दिन प्रशासन ने लालाजी को जेल से रिहा किया। क्या कोई सोच सकता है कि अंग्रेजों के राज के पश्चात स्वतंत्र भारत के इतिहास में लालाजी पहले व्यक्ति थे जिन्हें जेल जाना पड़ा। लालाजी ने यहां पर भी एक इतिहास स्थापित किया। इतने लम्बे अर्से तक न्याय और सच्चाई के लिए लड़ने वाले लालाजी और रमेशजी ने 1948 में उर्दू का हिंद समाचार और 1965 में हिन्दी के पंजाब केसरी का प्रकाशन जालन्धर से शुरू किया। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के अलावा जम्मू-कश्मीर में भी हिन्द समाचार उर्दू कश्मीर घाटी और पंजाब केसरी जम्मू के इलाके में एकमात्र दो ही समाचार पत्र थे जो सबसे ज्यादा प्रसार संख्या में बिकते थे। उधर 1977 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने जम्मू-कश्मीर की राज गद्दी शेख अब्दुल्ला को सौंप दी।

वैसे तो पं. नेहरू के जमाने से कश्मीर को विशेष दर्जा (Special Status)  और अनुच्छेद 370 देने की वजह से विद्रोह की आवाजें भारत में जगह-जगह से उठ रही थीं लेकिन लालाजी और रमेशजी की कलम उर्दू के हिन्द समाचार और हिन्दी के पंजाब केसरी में कश्मीर को विशेष दर्जा और अनुच्छेद 370 के विरुद्ध आग उगल रही थी। शेख साहिब की तानाशाही के विरुद्ध भी लालाजी और रमेशजी हर समय अपनी कलम से आवाज उठाते थे। धारा 370 को खत्म करने की पहली चिंगारी तो पूज्य लालाजी और पूज्य रमेशजी ने लगाई थी। 1947 से लालाजी और रमेशजी की शेख साहिब के विरुद्ध उठी आवाजों और धारा 370 को खत्म करने की मांग को पूरा किया वर्ष 2019 यानि 72 वर्ष बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की भाजपा सरकार ने। वरना पिछले 72 वर्षों में देश में विभिन्न सरकारें और प्रधानमंत्री आए लेकिन किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी जो कश्मीर की इस धारा 370 के ज्वलंत और भारत की अखंडता के लिए जरूरी इस मुद्दे को हाथ लगाए। सभी प्रधानमंत्री समझते थे कि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के लिए एक ऐसी तार को हाथ लगाना होगा जो करंट मारेगी।

इस दौरान वर्ष 1977 के दिसम्बर माह में एक किताब छपी जिसमें शेख परिवार की तानाशाही के किस्से और उनके परिवार द्वारा लूट-खसोट करके बेपनाह दौलत इकट्ठी करने के रहस्यों से पर्दा खुला। हिंद समाचार और पंजाब केसरी में इस किताब में शेख परिवार पर लगे आरोपों को शृंखलाबद्ध प्रकाशित किया जाने लगा। वैसे भी शेख साहिब हिंद समाचार और पंजाब केसरी को अपना घोर विरोधी मानते थे। बस जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला ने आव देखा न ताव अपना तानाशाही आदेश देकर हिंद समाचार और पंजाब केसरी के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी लेकिन तानाशाह शेख लालाजी और रमेश जी की कलम को रोक नहीं पाए। किस तरह हमने एक लम्बा कानूनी युद्ध शेख परिवार के विरुद्ध लड़ा और उच्चतम न्यायालय से शेख के तानाशाही आदेश पर विजय पाई, इसका जिक्र मैं कल के लेख में करूंगा।