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संपादकीय

‘जय श्री राम’ और ‘जय बांग्ला’

प. बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को वर्तमान लोकसभा चुनावों में मिली सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं मानी जा रही है क्योंकि यह राज्य आजादी के बाद से ही वामपंथ की तरफ झुकाव की लोक राजनीति को तरजीह देने वाला रहा है। राज्य में जिस तरह वामपंथी पार्टियों ने लम्बें समय तक शासन किया उससे इस राज्य की छवि कम्युनिस्ट विचारधारा के सहारे सामाजिक परिवर्तन को वरीयता देने की बनी परन्तु राज्य में कांग्रेस पार्टी ही इसे लगातार चुनौती देने की स्थिति में रही। इस लड़ाई में जनसंघ या भाजपा प्रारम्भ से ही हाशिये पर खड़ी रही, हालांकि इस पार्टी के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी राज्य के थे और स्वतन्त्रता पूर्व में संयुक्त बंगाल की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाते रहे थे। 

वह अंग्रेजी शासनकाल में 1936 में हुए प्रान्तीय एसेम्बली के चुनावों के बाद बनी राज्य की साझा मिली-जुली गैर कांग्रेसी सरकार में वित्त मन्त्री रहे थे मगर उस समय उनकी पार्टी हिन्दू महासभा थी। आजादी के बाद 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनावों में डा. मुखर्जी स्वयं इसी राज्य से चुन कर लोकसभा में पहुंचे थे और उनके साथ एक और अन्य जनसंघ सांसद चुना गया था। इन लोकसभा चुनावों में जनसंघ के कुल तीन सांसद चुने गये थे जिनमें से दो प. बंगाल से ही थे। अतः राज्य की राजनीति में अपनी विचारधारा के बीज डा. मुखर्जी बो कर तो गये थे परन्तु उन्हें पेड़ बनाने में बाद में उनकी पार्टी का कोई भी नेता सफल नहीं हो सका। यहां से भाजपा के सांसदों की अधिकतम संख्या दो तब भी रही जब केन्द्र में भाजपा नीत सरकारों का गठन हुआ। इनमें पिछली वाजपेयी सरकार भी शामिल थी परन्तु 2019 में वह कमाल हुआ जिसकी अपेक्षा स्वयं भाजपा को भी पूरी तरह नहीं थी।
 
इस पार्टी को राज्य की कुल 42 सीटों में से 18 पर सफलता प्राप्त हुई। यह चमत्कार जिस जमीनी सच्चाई की वजह से हुआ उसे राजनीति का ‘अर्थ शास्त्र’ कहा जाता है जिसमें विरोधी को पटखनी देने के लिए उसके मुखर विरोधी को वरीयता जानबूझ कर दे दी जाती है। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की नेता सुश्री ममता बनर्जी ने जिस तरह 2011 के विधानसभा चुनावों में वामपंथी सत्ता को उखाड़ कर फेंका था उससे वामपंथी दलों की राजनीति लगातार रसातल में जानी शुरू हो गई थी। ममता दी ने राज्य में कांग्रेस से अलग होकर ही 1998 में अपनी पृथक तृणमूल कांग्रेस बनाई थी और उसके बाद कांग्रेस पार्टी की जमीनी ताकत को अपने कब्जे में ले लिया था। 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्हें आपार जनसमर्थन मिला और वह 32 सीटों पर विजयी रही थीं। 

इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्हें पहले से भी बड़ी सफलता मिली और वह पुनः मुख्यमन्त्री बनीं परन्तु 2019 के आते-आते वह राज्य में भाजपा द्वारा चलाये जा रहे अभियान का मुकाबला राजनैतिक स्तर पर करने से उसी तरह चूक गईं जिस तरह 2011 में वामपंथी उनका मुकाबला करने से चूक गये थे। वर्तमान लोकसभा चुनावों में मार्क्सवादी पार्टी शुरू से ही हाशिये पर खेल रही थी। इसकी वजह यही थी कि वह भाजपा की उत्पन्न हो रही ताकत को समझ गई थी जो उसके केन्द्र में सत्तारूढ़ रहते उसे मिल रही थी। यही स्थिति कांग्रेस पार्टी की भी थी जो ममता दी के विरुद्ध 2016 के विधानसभा चुनावों में मार्क्सवादी पार्टी के साथ गठबन्धन करके चुनाव लड़ी थी। भाजपा ने लोकसभा चुनावों में हिन्दुत्व का वह विमर्श रखा था जो इस राज्य की ‘बांग्ला संस्कृति’ में ही मान्यता चाहता था। 

ममता दी ने इसका जिस तल्खी के साथ विरोध किया उससे जमीन पर वह काम हो गया जो भाजपा चाहती थी। राज्य में मार्क्सवादी पार्टी का जनाधार उन नागरिकों का रहा है जो 1947 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से प. बंगाल आये थे। यह मूल रूप से बांग्ला शरणार्थियों की पार्टी कहलाई जाती थी, जबकि उत्तर भारत में भी जनसंघ की जान पश्चिमी पाकिस्तान से आये शरणार्थी ही रहे हैं। अतः भाजपा द्वारा छेड़ा गया ‘जय श्रीराम’ का नारा तीर की तरह काम कर गया और ममता दी का इसका गुस्से में किया गया विरोध बांग्ला अस्मिता को नहीं जगा सका। जमीन पर अचानक भाजपा के अपने समर्पित वोट बैंक और वामपंथी वोट बैंक का समागम हो गया और सकल रूप से भाजपा तृणमूल कांग्रेस से केवल साढ़े तीन प्रतिशत मत ही अधिक प्राप्त कर सकी। 

राज्य में भाजपा वह विमर्श खड़ा करने में कामयाब हो गई जिसमें वामपंथी वोट बैंक को उसके पास जाने में दिक्कत महसूस नहीं हुई इसमें जय श्री राम नारा एक प्रतीक बन कर उभरा और ममता दी ने उसे अपमान की तरह लिया। मगर राज्य में भाजपा के लिये भी चुनौती थी कि इस राज्य में ‘वन्दे मातरम्’ उद्घोष से किसी भी समुदाय को किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होती है। अब प. बंगाल की राजनीति ने जिस तरफ रुख किया है उसमें आने वाले समय में वामपंथियों अथवा कांग्रेस के लिये ज्यादा जगह नहीं बची है क्योंकि भाजपा ने बहुत तेजी के साथ उनका स्थान अधिग्रहित कर लिया है। वास्तव में यही कमाल प. बंगाल में हुआ है। देखना होगा कि जय श्री राम और जय बांग्ला में किस तरह पटरी बैठती है, क्योंकि ममता दी ने जय बांग्ला को तरजीह दी है।