फौज को राजनीति से दूर रखो


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भारत के लोकतन्त्र में इसकी सशस्त्र सेनाओं की भूमिका को पूरी तरह गैर-राजनैतिक व अराजनैतिक बनाने की जो खूबसूरत व्यवस्था की गई है उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इन सभी बलों के सुप्रीम कमांडर भारत के राष्ट्रपति होते हैं जिन पर संविधान के संरक्षण की जिम्मेदारी होती है। यह संविधान ही भारत की सेनाओं को राजनीति से निरपेक्ष रहते हुए इसके अनुसार गठित किसी भी राजनैतिक दल की सरकार के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा के कार्य में संलग्न रहने का दायित्व सौंपता है। अतः राजनैतिक मोर्चे पर विभिन्न राजनैतिक दलों की प्रतिस्पर्धा से फौज का किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता और न उसे किसी भी राजनैतिक दल की ताकत बढ़ने या घटने से कोई सरोकार होता है क्योंकि उसका सम्बन्ध केवल संविधान के अनुसार गठित सरकार से होता है, इससे नहीं कि वह किस पार्टी की सरकार है। स्वतन्त्रता के बाद एेसे मौके प्रायः न के बराबर आये हैं जबकि हमारे फौजी जनरलों ने घरेलू राजनीतिक मुद्दों पर अपनी कोई राय प्रकट की हो। फौज के जनरल जब भी बोलते हैं तो भारत की सेनाओं की सुरक्षा ताकत के बारे में बोलते हैं और राष्ट्रीय सीमाओं की चौकसी के बारे में बोलते हैं और देशवासियों को विश्वास दिलाते हैं कि फौज किसी भी वक्त किसी भी खतरे का सामना करने को तैयार है मगर मौजूदा जनरल बिपिन रावत यदा-कदा बयानबाजी के उन पेंचों में फंस जाते हैं जिनका सिरा राजनीति के गलियारों से होकर गुजरता है।

असम भारत का एेसा राज्य है जो आजादी के बाद से ही पहले भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय हिन्दू-मुस्लिम आबादी को लेकर विवादों में रहा और बाद में 1971 में बंगलादेश के गठन को लेकर यही समस्या आगे बढ़ गई जबकि वास्तव में यह विवाद तभी समाप्त हो जाना चाहिए था क्योंकि बंगलादेश के बन जाने पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और बंगलादेश के प्रधानमन्त्री शेख मुजीबर्रहमान के बीच जो समझौता हुआ था उसके अनुसार मार्च 1971 तक सीमा के आर-पार से आने वाले लोग भारत या बंगलादेश में से किसी एक की राष्ट्रीयता के अपनी पसन्द के अनुसार हकदार हो सकते थे परन्तु यह सर्वविदित है कि किस प्रकार इस राज्य में असम गण परिषद की छात्र शाखा ‘अखिल असम छात्र परिषद’ का आन्दोलन शुरू हुआ और जिसमें असम नागरिकता का मुद्दा ही मूल में रहा परन्तु यह एेसा मुद्दा था जिससे फौज का दूर-दूर तक का कोई लेना-देना नहीं था और उसे इस बात से भी कोई मतलब नहीं था कि क्यों स्व. राजीव गांधी ने असम छात्र परिषद के साथ समझौता करके उसे एक राजनैतिक दल असम गण परिषद में परिवर्तित होने का अवसर देकर उसके हाथ में राज्य की सत्ता सौंपी। यह विशुद्ध रूप से एेसा राजनैतिक समझौता था जिसमें असम की सुख-शान्ति का सपना था मगर किसी भी राज्य की राजनीति उसमें रहने वाले लोग तय करते हैं और लोकतन्त्र उन्हें इस बात की पूरी आजादी देता है कि वे अपनी इच्छानुसार किसी भी राजनैतिक दल को समर्थन दें या न दें। फौज के जनरल को इस बात से क्या लेना-देना हो सकता है कि किसी भी राज्य की सम्प्रदायगत संरचना कैसी है? अथवा किस राज्य में कौन सी राजनैतिक पार्टी का प्रभाव बढ़ या घट रहा है।

यह वहां के लोगों का मूलभूत अधिकार है कि वे किस राजनैतिक दल को चुनते हैं और किसे नहीं मगर जनरल रावत ने न जाने किस आवेश में यह बयान एक गोष्ठी में दे डाला कि असम में अखिल भारतीय संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा की ताकत बढ़ने की रफ्तार भाजपा से भी ज्यादा है? इसकी वजह यहां की सम्प्रदायगत संरचना में बदलाव है। यह पूरी तरह एेसा बयान है जो जनरल की वीरता के मेडलों से सुसज्जित वर्दी से मेल नहीं खाता है। असम की आन्तरिक राजनीति के विभिन्न उलझे हुए या सीधे-सपाट पेंचों को देखने की जिम्मेदारी संविधान ने केन्द्र व राज्य की सरकारों को दी हुई है। इसके लिए भारतीय लोकतन्त्र की पूरी सुव्यवस्थित प्रणाली है और संवैधानिक संस्थान हैं जो पूरी मुस्तैदी के साथ अपना-अपना काम कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय तक की इस बारे में संलिप्तता है। अतः यह बयान अनाधिकार चेष्टा के रूप में ही देखा जायेगा मगर इस पर ज्यादा सियासत की गुंजाइश भी नहीं है जैसा कि कुछ खुद को मुस्लिम समुदाय के हिमायती कहलाने वाले लोग करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी बयानबाजी से हिन्दोस्तान की एकता को किसी भी तरीके से कमजोर नहीं किया जा सकता। जरा इन अक्ल के बादशाहों को जाकर कोई बताये कि पूर्वी पाकिस्तान को बंगलादेश किस फौज की मदद से बनाया गया था? एेसी वीर सेना जिसने मानवीयता को ऊपर रखकर बंगलादेश का ध्वज ढाका में अपनी सुरक्षा में फहराया हो उसे कोई भी ताकत राजनीति के कीचड़ में नहीं घसीट सकती।