उपराज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री


दिल्ली के उपराज्यपाल श्रीमान अनिल बैजल यदि यह सोच रहे हैं कि वह मुगलिया सल्तनत के मुन्तखिब किये गये ‘निजाम-उल-मुल्क’ की मानिन्द अपने मिजाज के मुताबिक हिन्दोस्तान के संविधान में लिखे हर्फों का मतलब निकाल सकते हैं तो उन्हें सबसे पहले राष्ट्रपति भवन जाकर अपनी हैसियत के बारे में पता करना चाहिए और समझना चाहिए कि इस देश के चार प्रमुख राज्यों के जनता द्वारा चुने गए मुख्यमन्त्रियों द्वारा उनसे मिलने की दरख्वास्त के क्या मायने होते हैं और वह अपने घर पर ही पिछले छह दिनों से बैठे हुए दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल से उन्हें मिलने से कैसे रोक सकते हैं? सरकार की तरफ से उन्हें रहने के लिए दिया गया राजभवन कोई ‘खाला का घर’ नहीं है कि वह चार राज्यों के मुख्यमन्त्रियों को इसमें आने से सिर्फ इसलिए रोक दें कि उनकी अरविंद केजरीवाल से पट नहीं रही है। उन्हें समझना ही होगा कि वह एेसे संवैधानिक पद पर बैठे हुए हैं जिसके मातहत दिल्ली की दो करोड़ जनता का चुना हुआ मुख्यमन्त्री उसके मसलों का हल निकालता है।

सवाल भाजपा या आम आदमी पार्टी का नहीं है बल्कि उस संवैधानिक व्यवस्था का है जिसके तहत दिल्ली का प्रशासन चलता है। इसी व्यवस्था के तहत उपराज्यपाल को अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि उसका कार्य केवल संविधान के अनुसार दिल्ली की सरकार को काम करते देखना है मगर क्या सितम हो रहा है कि पिछले चार महीने से दिल्ली सरकार के आईएएस अफसर खुलेआम दिल्ली के मन्त्रियों की अवमानना कर रहे हैं और वह सारा तमाशा चुपचाप देख रहे हैं। बिना शक अरविन्द केजरीवाल और मुख्य सचिव के बीच अर्द्धरात्रि को हाथापाई का मामला अदालत में है मगर इसके आधार पर समूचे दिल्ली के प्रशासन को पंगु नहीं किया जा सकता।

अदालत में चल रहे मामले से अलग रहते हुए उपराज्यपाल को यह देखना होगा कि दिल्ली की जनता द्वारा चुनी गई सरकार के जायज हकों पर इस घटना की वजह से कोई गलत असर न पड़े। यह कैसे संभव है कि कोई मुख्यमन्त्री लगातार उपराज्यपाल से मिलने का समय मांगे और उपराज्यपाल लगातार उसे इस तरह टालता रहे कि मुख्यमन्त्री को मजबूरन उसके घर में आकर ही धरना देना पड़े! इतना ही नहीं बल्कि चार राज्यों प. बंगाल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और केरल के मुख्यमन्त्री क्रमशः सुश्री ममता बनर्जी, एच.डी. कुमारस्वामी, चन्द्रबाबू नायडू व पी.एन. विजयन को भी जबानी तौर पर कह दिया जाए कि आप अरविन्द केजरीवाल से मेरे घर में नहीं मिल सकते! जाहिर तौर पर यह संविधान की उस मर्यादा का सीधा उल्लंघन है जो एक मुख्यमन्त्री को यह अलिखित अधिकार देती है अपने राज्य से बाहर जाने पर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग उसके उस सम्मान को पूर्णतः सुरक्षा देंगे जो उसे संविधान ही अपने राज्य में देता है।

मगर मामला जिस तरह आगे बढ़ाया गया है उससे उपराज्यपाल पद की गरिमा पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। क्योकि दिल्ली के मामले में उपराज्यपाल अपने दायित्व का निर्वाह करने में गफलत का शिकार होते नजर आ रहे हैं और उनका व्यवहार बता रहा है कि वह संविधान की भाषा की जगह राजनीति की भाषा बोल रहे हैं। किसी भी उपराज्यपाल की शिकायत यदि देश के गृहमन्त्री से इस बात को लेकर की जाती है कि वह अपने ही ‘अर्द्ध राज्य’ के मुख्यमन्त्री से मिलने में आनाकानी कर रहे हैं तो यह सीधा उस लोकाचार (प्रोटोकोल) का उल्लंघन है जो नियमतः जनमत से चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के बीच में स्थापित रहता है। आज मैं इस विषय में नहीं जा रहा हूं कि दिल्ली की सरकार चलाने में अरविन्द केजरीवाल किस तरह की नाटकबाजी करते रहे हैं बल्कि इस मुद्दे पर केन्द्रित रहना चाहता हूं कि उपराज्यपाल के पद पर आसीन व्यक्ति का व्यवहार और आचरण संवैधानिक दृष्टि से कैसा रहता है।

अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की सरकार को मिले अधिकारों के तहत अपना काम उसी तरह कर सकते हैं जिसकी ताईद संविधान में की गई है और इसके लिए उन्हें उपराज्यपाल के पास जाना ही होगा। यह देखना उपराज्यपाल का काम नहीं है कि राजनीतिक धरातल पर आम आदमी पार्टी की सरकार को किस नजरिये से लिया जाता है। इसका फैसला करने के लिए दिल्ली की जनता पुर-अख्तियार है मगर वह चुनी हुई सरकार की इस शिकायत को नजरंदाज नहीं कर सकते कि राज्य की पूरी अफसरशाही चुने हुए मन्त्रियों के मातहत काम करने से इंकार कर रही है। लोकतन्त्र की संसदीय शासन व्यवस्था चुने हुए मन्त्रियों को ही प्रशासन के लिए जिम्मेदार मानती है। बड़े से बड़े अफसर की जवाब-तलबी करने का हक हमारा लोकतन्त्र मन्त्री को इसीलिए देता है कि वह जनता का प्रतिनिधि होता है। अर्द्ध राज्य दिल्ली के सम्बन्ध में नियमों में परिवर्तन तो हो सकता है मगर लोकतन्त्र के इस सिद्धान्त में बदलाव नहीं हो सकता। जब नियमों के तहत उपराज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह अफसरशाही को नियमतः काम करते देखें तो गफलत पैदा होने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

राजनीतिक मोर्चे पर अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी क्या पैंतरेबाजी करती है उससे उपराज्यपाल का लेना-देना नहीं है, उनका लेना-देना सिर्फ इतना है कि दिल्ली का मुख्यमन्त्री उनके निर्देशन में उन कामों को अंजाम दे सके जो उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं, बाकी का कारोबार अरविन्द केजरीवाल का है जिसे वह राजनितिक स्तर पर सुलटते रह सकते हैं। ममता दी के इस कथन का बहुत बड़ा मतलब निकलता है कि यदि देश की राजधानी में ही यह स्थिति बन सकती है तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था के क्या मायने रह जाएंगे? हमारी बहुदलीय व्यवस्था में एेसे पुख्ता प्रावधान हैं कि केन्द्र व राज्यों की अलग-अलग दलों की सरकारें पूरे सहयोग के साथ बेरोक-टोक काम कर सकें। बिना शक अरविन्द केजरीवाल टकराव की सियासत करते रहे हैं और खुद को बेचारा दिखाने की उनकी फनकारी दिल्ली वालों को गुमराह करती रही है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उपराज्यपाल भी इसी नीति पर चलना शुरू कर दें। केजरीवाल को अपनी हरकतों का जवाब तो अन्ततः आम जनता को देना होगा मगर उपराज्यपाल तो केवल संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं। इस फर्क को अगर भुला दिया जायेगा तो दिल्ली उस ‘अराजकता’ में डूब जाएगी जिसकी पैरवी एक समय में अरविन्द केजरीवाल खुद करते रहे हैं। अतः बहुत जरूरी है कि दिल्ली को अराजकता का आइना न बनने दिया जाए।