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संपादकीय

मलिक का सियासी ‘मल्ल युद्ध’

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लगता है जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल माननीय सत्यपाल मलिक अपनी उम्र के पड़ाव से ठीक 45 साल पीछे पहुंच गये हैं, जब एक छात्र नेता के रूप में वह युवाओं की जनसभाओं को सम्बोधित करते हुए नौजवान साथियों की रगों में जोश को दौड़ाते हुए पूरी व्यवस्था को बदलने का दम भरते हुए कहा करते थे कि “आपके और मेरे पैसे से आलीशान होटलों में बैठ कर शराब पीने वाले ये हुक्मरान नहीं जानते कि जमीन पर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए दिन–रात मेहनत करने वाला आम हिन्दोस्तानी ही इस मुल्क को बनाने में सबसे आगे रहा है और आजाद हिन्दोस्तान उसकी मेहनत का ही मुआवजा चाहता है।’’

मैं श्री मलिक के उन भाषणों की एक झलक पेश कर रहा हूं जो 1969-70 में वह मेरठ कालेज छात्र संघ के निवर्तमान अध्यक्ष होने के नाते दिया करते थे। इससे एक साल पहले तक वह समाजवादी युवजन सभा के सदस्य के रूप में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस सबसे बड़े शिक्षण संस्थान के छात्र संघ के ऐसे यशस्वी अध्यक्ष थे जिन्हें अपनी नव निर्मित भारतीय क्रान्ति दल पार्टी में शामिल करने के लिए स्व. चौधरी चरण सिंह ने कई सन्देश भिजवाये थे मगर मूलतः लोहियावादी होने की वजह से उन्होंने यह मंजूर नहीं किया था। हालांकि बाद में 1974 के आते-आते वह चौधरी साहब की नई पार्टी लोकदल में ही शामिल हो गये थे। सत्यपाल मलिक मूलतः विद्रोही प्रवृत्ति के जुझारू गांधीवादी कहे जा सकते हैं जिन्होंने नब्बे के दशक में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामना उचित समझा। 

लगभग एक वर्ष पूर्व जब उन्हें जम्मू-कश्मीर जैसे संजीदा राज्य का राज्यपाल मोदी सरकार ने नियुक्त किया तो उसके पीछे उनका बिहार के राज्यपाल के रूप में किया गया कार्य बोल रहा था। जब वह राज्यपाल थे तो वर्तमान मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने लालू जी के राष्ट्रीय जनता दल से अपना महागठबन्धन समाप्त करके पुनः भाजपा का दामन थाम लिया था। इस स्थिति में संविधान के मुखिया के तौर पर श्री मलिक ने बखूबी अपने काम को अंजाम दिया था और राज्य की बदली हुई शिखर राजनीति से उत्पन्न समीकरणों के कसैलेपन को जमीन पर नहीं फैलने दिया था। अतः जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में उनसे अपेक्षा बनी थी कि वह इस राज्य में उस लक्ष्य की प्राप्ति करेंगे जिससे यहां का राजनैतिक वातावरण पूर्णतः लोकमूलक होकर आम जनता में नये विश्वास का संचार कर सके। 

उनकी नियुक्ति राज्य में पिछले साल भाजपा व पीडीपी की साझा महबूबा मुफ्ती सरकार के पद त्याग के बाद राज्यपाल शासन के अधीन हुई थी। प्रशासनिक मुखिया के तौर पर उन्होंने सूबे में लोकतन्त्र की स्थापना के लिए स्थानीय निकायों के पिछले अर्से से लम्बित पड़े चुनाव भी कराये और इसके समानान्तर आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेनाओं द्वारा चलाये जा रहे अभियान को भी जारी रखा। आतंकवाद से जम्मू-कश्मीर को मुक्त कराने में भारत की सेनाएं एक हद तक सफल भी रही हैं परन्तु घाटी में स्थानीय लोगों को पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी गतिविधियों में धकेलने में भी एक सीमा तक सफल रहे हैं हालांकि अब इसमें बहुत ज्यादा कमी आ चुकी है। 

ऐसे समय में उनका कारगिल- लद्दाख पर्यटन समारोह के उद्घाटन समारोह में यह आह्वान करना कि जिन लोगों ने हथियार उठा रखे हैं उन्हें भ्रष्ट अधिकारियों व राजनीतिज्ञों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए न कि पुलिस के अफसरों के खिलाफ, वास्तव में आक्रोश व झुंझलाहट और खीझ का ही प्रदर्शन है। संविधान के किसी भी मुखिया से इस प्रकार की भाषा की अपेक्षा लोकतन्त्र में इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि उसका मूल कार्य संविधान के अनुसार ही प्रत्येक नागरिक को न्याय दिलाने का होता है। बेशक जम्मू-कश्मीर में राजनीति को पूरी तरह दो–तीन परिवारों के लोगों ने अगवा कर लिया है और इसकी सम्पत्ति में भी बेहिसाब इजाफा हुआ है मगर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उन्हें आतंकवादी अपनी गोलियों का निशाना बना डालें। 

श्री मलिक का यह कहना कि राज्य की सम्पत्ति को भ्रष्ट अधिकारियों ने भी लूटा है, एक वजह हो सकती है मगर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए इस मुल्क में कारगर कानून भी हैं। लोकतन्त्र में अतः यह लोगों का ही अधिकार होता है कि वे किस सियासी तंजीम को हुकूमत सौंपते हैं। राज्य के शेख अब्दुल्ला और मुफ्ती सईद परिवारों का अगर सियासत में अभी तक दबदबा रहा है तो इसमें लोगों का दोष नहीं है बल्कि उन हालात का दोष है जिनकी वजह से लोग बार–बार इन्हें ही चुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में तो भ्रष्टाचार का ऐसा सिलसिला रहा है कि इसने इस सूबे की पूरी सियासत को ही भ्रष्ट बना दिया है। 

जम्मू-कश्मीर के राजनीतिज्ञाें, हुर्रियत के नागों, अलगाववादियों ने माल बटोर-बटोर कर विदेशों में और दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों में सम्पत्तियां अर्जित कर लीं। इनके बच्चे तो विदेशों में पढ़ते हैं जबकि कश्मीरियों के बच्चों के हाथों में इन्होंने पत्थर पकड़वा दिए।मेरे परम पूज्य दादाजी लाला जगत नारायण जी और पूज्य रमेश जी ने 1980 में हिन्द समाचार और पंजाब केसरी में मरहूम शेख अब्दुल्ला पर एक धारावाहिक सम्पादकीय लिखा था- ‘स्कूल मास्टर से मुख्यमंत्री तक।’ जिसमें उन्होंने शेख अब्दुल्ला के भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा खोला था। तब शेख अब्दुल्ला सरकार ने हिन्द समाचार और पंजाब केसरी पर जम्मू-कश्मीर में प्रतिबन्ध लगा दिया था। तब हमने प्रैस की स्वतंत्रता के लिये सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और शीर्ष अदालत ने प्रतिबंध हटाया।

  मुझे आज भी याद है कि जब पूज्य पिता जी ने सुप्रीम कोर्ट में यह केस डाला कि हिन्द समाचार और पंजाब केसरी पर जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंध लगाने का अर्थ है भारत के संविधान में दी गई प्रैस की आजादी पर प्रतिबंध। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिए थे कि या तो शेख सरकार इसी वक्त हिन्द समाचार और पंजाब केसरी से जम्मू-कश्मीर में प्रवेश पर रोक हटाए वर्ना हम शेख सरकार की बर्खास्तगी का हुक्म देंगे। 

एक प्रदेश सरकार कैसे संविधान द्वारा दी गई प्रैस की आजादी की अवहेलना कर सकती है।इस पर घबरा कर शेख अब्दुल्ला सरकार ने उसी वक्त हिन्द समाचार और पंजाब केसरी से जम्मू-कश्मीर में लगे प्रतिबंध को हटा​ लिया।लाला जी का भी यह विचार था कि आतंकवादियों और पाकिस्तानी समर्थक हुर्रियत के नागों की जगह जेल में है। यदि ऐसा किया जाता तो कश्मीर समस्या कब की खत्म हो गई होती और कश्मीर का अवाम राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल हो गया होता।