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1965 का शहीदी सितम्बर !

स्वतन्त्र भारत के इतिहास मंे सितम्बर महीने का महत्व इस तरह दर्ज है कि 3 सितम्बर, 1965 को पाकिस्तान के साथ शुरू युद्ध के दौरान भारतीय फौजें लाहौर तक पहुंच गई थीं और  पाकिस्तानी हुक्मरान फील्ड मार्शल अयूब खां को चीन की शरण में जाकर मन्त्रणा करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हम आज 9 सितम्बर को  न्यूयार्क में 20 साल पहले हुए वर्ल्ड टावर पर हुए आतंकवादी हमले को तो याद रखते हैं मगर 55 साल पहले हुए इस युद्ध को लगभग भूल चुके हैं जबकि इस युद्ध में भारत की थल सेना के साथ वायुसेना ने वह जौहर दिखाया था कि युद्ध विराम की घोषणा के बाद अयूब ने अपने मन्त्रियों की एक आपातकालीन बैठक बुला कर कहा था कि ‘मैं 50 लाख कश्मीरियों के लिए 10 करोड़ पाकिस्तानियों की जिन्दगी दांव पर नहीं लगा सकता’ (उस समय आबादी यही थी)। 

दरअसल यह युद्ध पाकिस्तान की इस ‘खाम खयाली का नतीजा था कि पं. जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद भारत में बहुत ही कमजोर प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री गद्दी नशीं हुए हैं और 1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद भारतीय सेनाओं में उस पाकिस्तान का मुकाबला करने की ताकत नहीं बची है जिसके पास अमेरिका द्वारा दी गई आधुनिकतम सैनिक सामग्री है जिनमें पेटन टैंक से लेकर फाइटर विमान व कोबरा मिसाइलें तक शामिल हैं। नई पीढ़ी के पाठकों को याद रखना चाहिए कि इसी युद्ध के दौरान शास्त्री जी का यह वाक्य पूरे भारत की गीता और कुरान बन गया था कि ‘कश्मीर भारत का अटूट अंग है’। अयूब को यह धोखा हो गया था कि अपने अमेरिकी फौजी असले के बूते पर पाकिस्तान कश्मीर को दबोच सकता है अतः 3 सितम्बर को अयूब की फौजों ने जम्मू-कश्मीर के ‘छम्ब’ इलाके में हमला बोल कर आगे बढ़ना शुरू कर दिया। जब इसकी खबर भारतीय फौज के जनरल चौधरी व वायुसेना के एयर चीफ मार्शल अर्जुन सिंह को मिली तो वे दोनों इसी दिन की शाम को नई दिल्ली में रक्षामन्त्री श्री यशवन्त राव चव्हाण से मिलने उनके साऊथ ब्लाक स्थित कार्यालय आये और यहां फैसला हुआ कि रात होने से पहले ही भारतीय वायुसेना छम्ब के इलाके में हवाई गोलाबारी करके पाकिस्तानी सेना को आगे बढ़ने से रोक दें। इसके साथ ही पूर्ण युद्ध शुरू हो गया जो 22 दिन तक चला। इस युद्ध के दौरान जब भारतीय फौजों ने फैसला किया कि कश्मीर में पाकिस्तानी फौजों को बढ़ने से रोकने के लिए दूसरे मोर्चों पर उसकी फौजों को उलझाना बेहतर रणनीति होगी अतः लाहौर व स्यालकोट की तरफ भारतीय सेनाओं ने अन्तरराष्ट्रीय सीमा लांघ कर आगे बढ़ना शुरू किया औऱ पाकिस्तान को भौंचक्का कर दिया। कुछ ही दिनों में भारतीय फौजों ने लाहौर के करीब अपना डेरा डाल दिया और स्यालकोट  के नजदीक भी पहुंच गईं। 

इस खबर के मिलते ही प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने तब आकाशवाणी पर राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए यह घोषणा की कि ‘हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। उन्होंने सोचा था कि वे हमारे कश्मीर में वे कुछ गड़बड़ कर सकते हैं तो हम भी टहलते-टहलते लाहौर तक पहुंच गये हैं।’ शास्त्री जी के इस उद्बोधन ने पूरे भारत में इतना जोश भरा कि उस समय स्कूलों तक के बच्चों की जुबान पर उनका यह कथन झूमने लगा। लाहौर के करीब इच्छोगिल नहर पर भारतीय फौजों ने जब अपना मुंह धोया तो एेसा लगा कि 1947 में जो पाकिस्तान हमसे अलग हुआ था उसे हमने फतेह कर लिया है। मगर इस मुकाम तक पहुंचने के लिए भारत के रणबांकुरे जवानों ने बहुत कुर्बानियां दीं। जिनमें हवलदार अब्दुल हमीद का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। भारत माता के इस महान सपूत ने अमेरिकी पेटन टैंकों को ध्वस्त करने का नया रिकार्ड बनाया और वह भी देसी तकनीक विकसित करके। भारत के पास उस समय द्वितीय विश्व युद्ध के पुराने टैंक थे जो अमेरिकी पेटन टैंकों का मुकाबला नहीं कर सकते थे। पाकिस्तानी फौजों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए हवलदार अब्दुल हमीद ने यह नायाब तरीका अपनाया और अपनी आहुति दे दी। तब यह नारा घर-घर गूंजा था  ‘अमर शहीद-वीर अब्दुल हमीद’।

 10 सितम्बर को उनका शहीदी दिवस था जो बिना किसी शोर-शराबे के गुजर गया। अयूब ने हताशा में नई दिल्ली को भी पाकिस्तानी विमानों के निशाने पर रखा हुआ था क्योंकि फील्ड मार्शल अयूब 18 सितम्बर को कराची के राष्ट्रपति भवन से निकल कर पेशावर होते हुए तब चीन भागे थे जब भारतीय वायुसेना कराची को अपने निशाने पर रखे हुए थी। लाहौर और स्यालकोट भारतीय फौजों की पहुंच में आ चुका था। अतः नई दिल्ली के 10 जनपथ स्थित शास्त्री जी के निवास पर भी कड़ा फौजी पहरा था और इसमें बंकर तक बना दिया गया था। जिसमें शास्त्री जी को अपने परिवार के साथ कई बार पाकिस्तानी हवाई हमले के अंदेशे के दौरान जाकर छिपना भी पड़ता था।  एक बार तो ऐसा भी हुआ कि शास्त्री जी को लगातार तीन-चार दिन तक राष्ट्रपति भवन तक में जाकर रहना पड़ा।

 22 दिनों बाद यह युद्ध राष्ट्रसंघ के हस्तक्षेप पर बन्द हुआ तो भारत के कब्जे में पाकिस्तान की 1080 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा भूमि थी और पाकिस्तान के कब्जे में भारत की 540 वर्ग किलोमीटर। लाहौर और स्यालकोट हमारे कब्जे में आये से लगते थे। लेकिन बाद में जनवरी 1966 के प्रथम सप्ताह में अयूब व शास्त्री जी के बीच सोवियत प्रधानमन्त्री कोसिगिन की मध्यस्थता में बैठक ताशकन्द में हुई और दोनों पक्ष अपनी-अपनी पुरानी जगह वापस लौट गये। इस युद्ध में भारत के तीन हजार जवान शहीद हुए जबकि पाकिस्तान के 3800 सैनिक हलाक हुए। उन शहीदों को नमन करने का सितम्बर महीना हर साल आता है और हम इसे भुला बैठे हैं।