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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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राष्ट्रीय ईंधन नीति की जरूरत

भारत इस समय राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर जिस तरह जूझ रहा है उसकी स्वतन्त्र भारत के इतिहास में दूसरी मिसाल मिलना कदाचित असंभव है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण लद्दाख में चीनी सेनाओं द्वारा नियन्त्रण रेखा पर पिछले तीन महीने से किये जा रहे अतिक्रमण की कोशिशें हैं और इसके समानान्तर भारत में लगातार ढहती अर्थव्यवस्था है जिसकी  वजह किसी हद तक कोरोना वायरस का प्रकोप भी कहा जा सकता है परन्तु यही एकमात्र कारण नहीं है, ऐसे संजीदा वक्त में जब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव लगातार औंधे मुंह नीचे गिर रहे हैं तो भारत में पेट्रोल व डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि हमारी अर्थव्यवस्था की नाजुक हालत काे ही बयान करती है, हकीकत यह है कि उत्पादनशील गतिविधियों से राजस्व वसूली की उम्मीद कम हो जाने की वजह से ही कोई भी सरकार ऐसे ‘सरल’ कदम उठाने को प्रेरित हो सकती है जिनका लोकतन्त्र पुरजोर तरीके से निषेध करता है। समाजवादी चिन्तक स्व. डा. राम मनोहर लोहिया अक्सर इस बात पर जोर दिया करते थे कि सरकार का काम लाभ कमाना नहीं होता। वह यह भी कहते थे कि लोकतन्त्र में सरकार कभी भी ‘वणिक’ वृत्ति से नहीं चला करती बल्कि वह ‘श्रमिक’ वृत्ति से चलती है, वणिक वृत्ति श्रमहीन गतिविधियों से पूंजी में वृद्धि करने की बिसात बिछाती है जबकि श्रमिक वृत्ति अपनी मेहनत के बूते पर जीवन-यापन का साधन जुटाती है, वणिक वृत्ति किसी सूदखोर महाजन की तरह लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा कर अपना खजाना उसी तरह भरती है जिस तरह वह दी गई रकम पर चक्रवृद्धि ब्याज लगा कर।

डा. लोहिया ने ऐसी सरकार को निकम्मी सरकार बताते हुए कहा कि श्रमिक वृत्ति और ज्यादा मेहनत करके ही अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार करती है, अतः लोकतन्त्र में सरकार केवल तभी किसी भी वस्तु पर शुल्क की दर बढ़ा सकती है जबकि वह उसी अनुपात में नये रोजगारों का सृजन करे, इसमें भी आम लोगों की दैनिक जरूरत की चीजों को उसे बख्शना होगा, यह डा. लोहिया की परिभाषा थी जो उन्होंने एक अर्थशास्त्री और समाज शास्त्री की हैसियत से तय की थी, मगर भारत की आज की हकीकत यह है कि आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू करने के बाद डा. मनमोहन सिंह ने पेट्रोलियम क्षेत्र को नहीं छुआ था। इस क्षेत्र को सीधे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के भावों से जोड़ने की शुरूआत श्री पी. चिदम्बरम ने तब की जब वह 1996 से 98 तक देवेगौड़ा व गुजराल सरकार के वित्त मन्त्री थे, उद्देश्य साफ था कि भारत की औद्योगिक प्रगति के चलते देश का पेट्रोलियम आयात बिल हर वर्ष बढ़ रहा था और विदेशी मुद्रा डालर का भाव सीधे बाजार की शक्तियों पर निर्भर था जिसकी वजह से पेट्रोल व डीजल पर सब्सिडी का सरकारी खर्चा हर वर्ष बेतहाशा बढ़ रहा था। बाद में मनमोहन सरकार के जमाने में पेट्रोल पर सब्सिडी खत्म की गई और कालान्तर में मोदी सरकार ने डीजल पर भी सब्सिडी समाप्त कर दी, जिसकी वजह से अब पेट्रोल व डीजल के भावों में अन्तर समाप्त हो गया है परन्तु दुखद यह है कि पूरे देश में पेट्रोल व डीजल के भावों को स्थिर रखने की दिशा में कभी गंभीरता से विचार केवल इसलिए नहीं किया गया कि इससे सरकार को राजस्व उगाही में घाटा हो सकता है।

भारत के ही पड़ोसी कुछ अन्य देशों मलेशिया व इंडोनेशिया में इस बारे मे स्वष्ट नीति है जिससे अर्थव्यवस्था पर घटती-बढ़ती तेल की कीमतों का दुष्प्रभाव न पड़ सके। इन देशों में पेट्रोल व डीजल की कीमतों का एक दायरा ‘प्राइस बैंड’ निश्चित कर दिया गया है जिसके अनुरूप सरकार उत्पाद व आयात शुल्क में घट-बढ़ करती रहती है मगर भारत में सरकार अपने खजाने को भरा-पूरा रखने के लिए उत्पाद व आयात शुल्क में घट-बढ़ करती है। मूल अन्तर यही है जिसकी वजह से पेट्रोल व डीजल के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं और लाॅकडाऊन काल के दौरान तक इन्हें नहीं बख्शा गया। सख्त जरूरत इस बात की है कि संसद के आगामी वर्षाकालीन सत्र के दौरान ही देश की एक स्पष्ट ईंधन नीति बने जिससे पेट्रोल व डीजल की कीमतों की अस्थिरता समाप्त हो, इसे लेकर सभी राजनैतिक दलों को एक मंच पर आने की जरूरत भी है। यह दुखद है कि पिछले 23 दिनों में 22 बार पेट्रोल की  कीमतों में इजाफा इतना हो चुका है कि  इससे वार्षिक रूप से सरकार को एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये की आमदनी होगी। इस आमदनी में सरकार अगर देश के आधे 13 करोड़ गरीब परिवारों को दस-दस हजार रु. दे तो केवल एक लाख 20 हजार करोड़ रु. के लगभग खर्च होंगे।

पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ा कर अगर लाॅकडाऊन से बुरी तरह ‘डाऊन’ हुए गरीब आदमी को मदद कर दी जाये तो सरकार का दाम बढ़ाने का तर्क वाजिब ठहराया जा सकता है लेकिन यह ध्यान रखने की बात है कि भारत ने तरक्की की हो तो उसका खामियाजा आम आदमी से वसूला नहीं जा सकता बल्कि और तरक्की करने के लिए उसे प्रेरित किया जाना चाहिए। भारत के गांवों तक में अब बाइसाइकिल की जगह मोटर साइकिल ने ले ली है जिसकी मार्फत औसत आदमी अपनी यातायात से लेकर व्यापारिक जरूरतें तक पूरी करता है। महानगरों में तो अब साधारण पेशेदार व्यक्ति भी मोटरसाइकिल का प्रयोग करता है। भारत के कस्बों में अब स्कूटर या मोटरसाइकिल का मालिक होना जन-जीवन का हिस्सा हो चुका है। निजी यातायात का यह सस्ता और सुगम साधन माना जाता है। जाहिर है कि पेट्रोल का ही जब यह असर है तो गांवों में डीजल के भाव बढ़ने का क्या असर होगा। यह बात दीगर है कि डीजल की सर्वाधिक एक तिहाई खपत सार्वजनिक क्षेत्र जैसे रेलवे आदि में ही होती है। अतः इसका असर व्यापक होगा और खास तौर पर किसानों पर तो सबसे ज्यादा होगा क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र तो रोशनी और ऊर्जा के लिए आज भी डीजल पर ही निर्भर करते हैं। अतः पेट्रोल व डीजल अब आवश्यक उपभोक्ता सामग्री बन चुका है।