जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा है और जिस तरह से आतंकवादी फन उठा रहे हैं, सचमुच यह किसी अनिष्ट की आहट है। सुरक्षा बलों, पुलिस और सीआरपीएफ तथा सेना के जवानों की मुस्तैदी से जम्मू-कश्मीर बचा हुआ है। आतंकवादियों ने जिस तरह से पिछले दिनों पवित्र रमजान के मौके पर सेना के एकतरफा सीजफायर का नाजायज फायदा उठाया और जिस तरह से पिछले हफ्ते में हमारे 12 जवान शहीद हुए उसका जवाब तो देना ही होगा। आज मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती जितनी भी आतंकवादियों के कारनामों की निंदा कर लें पर सच तो यही है कि उन्हें सर चढ़ाने वाली भी तो महबूबा ही हैं। मंगलवार से गुरुवार तक जिस तरह से आतंककियों ने हमारे बीएसएफ के जवानों को निशाने पर लिया, उसका जवाब देशवासी चाहते हैं।

दो दिन पहले बीएसएफ के चार जवानों ने अपने प्राण देश के नाम न्यौछावर कर दिए और जिस प्रकार कलम के पुरोधा सुजात बुखारी की ईद से पहले नृशंस हत्या की गई, देशवासी चाहते हैं कि सरकार आतंकवादियों को करारा जवाब दे। इस में केन्द्र को देर-सवेर फैसला लेना ही होगा। गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि एकतरफा सीजफायर केवल रमजान तक सीमित था और अब आतंकवादियों ने वार्ता की राह से जिस तरह से अपने आप क पलटा है तो वे परिणाम भुगतने को भी तैयार रहें। हम गृहमंत्री की बात से सहमत हैं कि एक दांव उन्होंने रमजान के दौरान एकतरफा सीजफायर को लेकर खेला था तो उसके पीछे महबूबा सईद की वह गुहार थी जिसमें उन्होंने यह कहा था कि आतंकवादी खून-खराबा नहीं करेंगे पंरतु गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया था कि अगर आतंकवादी सुरक्षाबलों पर गोलियां चलाएंगे तो इसका करार जवाब मिलेगा। इसीलिए अब लोग कह रहे हैं कि आतंकवादियों को करारा जवाब देने का वक्त आ गया है।  राजनीतिक दृष्टिकोण से ही अगर सुलगते कश्मीर को शांत रखना है तो क्या वहां राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जा सकता। आए दिन जवानों के खून बहने की घटनाओं को भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

आतंकियों को यद्यपि हमारे सुरक्षा जवानों ने कई आप्रेशनों के दौरान निबटाया है लेकिन हम समझते हैं कि आतंकवादियों को जहां देखों वहीं गोली मारो जैसी नीति होनी चाहिए तो उससे उनके आकाओं को भी सबक मिल जाएगा। पाकिस्तान के हुक्मरान यद्यपि पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो चुके हैं परंतु देशवासी यही चाहते हैं कि आतंक और आतंकवादियों का खात्मा अब सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए। सरकार कुछ भी करे भले ही महबूबा को निबटाए या राष्ट्रपति शासन लगाए जवानों का खून बहना बंद होना चाहिए। यही देशवासियों को सरकार से सबसे बड़ी दरकार है। यहां हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि सोशल मीडिया पर कश्मीर घाटी को लेकर जिस तरह आज की तारीख में लोग अलर्ट हैं और हमारे सेना के जवानों के साथ जुड़े हुए हैं तो अब यही लोग साफ कह रहे हैं कि पत्थरबाजों को जिस तरह से महबूबा ने छूट दी है उनको सजा कब मिलेगी।

पत्थरबाज हों या आतंकी दोनों का आचरण एक ही है। सेना के जवान अगर पत्थरबाजों से निबटते हैं और मुख्यमंत्री ऐसे 9 हजार से ज्यादा पत्थरबाजों के खिलाफ केस भी खत्म करवा देती हैं तो बताइए जवानों के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा? लोग इस मामले में कह रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने महबूबा सरकार को आखिरकार समर्थन क्यों दे रखा है। अगर सोशल साइट्स की बातचीत की जाए तो लोग एक-दूसरे से यह भी शेयर कर रहे हैं कि कल तक प्रधानमंत्री मोदी यही कहते थे कि जवानों का सर काटकर ले जाने वाले पाकिस्तानी सैनिकों की क्रूरता पर चुप रहने वाले मनमोहन जैसे पीएम देश को नहीं चाहिए लेकिन अब भाजपा के शासन में आज की तारीख तक 77 जवान शहीद हो चुके हैं। महबूबा सरकार ने 52 आतंकवादियों को मुख्य धारा में लाने की बात करके जेलों से छुड़वा दिया है।

पत्थरबाज चुन-चुन कर सुरक्षाबलों और पुलिस को निशाना बना रहे हैं और उन पत्थरबाजों को सजा नहीं दी जा रही जबकि पत्थरबाजों से लोहा लेने वाले जवानों के खिलाफ केस दर्ज किए जा रहे हैं। तो बताइए सोशल साइट्स पर एक-दूसरे से शेयर करने वाली इन भावनाओं के प्रति कोई खामोश कैसे रह सकता है? कहने वाले कह रहे हैं कि कश्मीर में धारा 370 कभी भाजपा के एजेंडे में हुआ करती थी लेकिन आतंकवादियों ने इस विशेष राज्य के दर्जा वाले जम्मू-कश्मीर में कश्मीरियों पर हमेशा कहर बरपाया और अब जिस तरह से एक संपादक की उसके दो गनमैनों सहित हत्या कर दी है तो पंजाब का वह आतंकवाद का खूनी दौर याद आता है जब पंजाब केसरी के संस्थापक अमर शहीद लाला जगत नारायण और शहीद शिरोमणि संपादक श्री रमेश चन्द्र जी की हत्या की थी।

खून की होली चाहे पंजाब में खेली जाए या घाटी में, आतंकवादियों का खात्मा तो हो ही जाना चाहिए। लोग सोशल साइट्स पर एक-दूसरे से पूछ रहे हैं कि अगर अब भी पहले की तरह कश्मीर घाटी में खून-खराबा हो रहा है तो कांग्रेस और भाजपा सरकार में फर्क क्या रह गया? इससे पहले कि बहुत देर हो जाए सरकार को आतंकी उनके प्रमोटरों को निबटा देना चाहिए। लोगाें का दिल जीतने और सुरक्षा के ​लिए राजनीतिक दृष्टिकोण से सरकार को राष्ट्रपति शासन का दाव अगर खेलना पड़े तो इसे खेल देना चाहिए।