दुनियाभर में जहां युवा नेतृत्व को आगे लाने की बात होती है वहीं मलेशिया में पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद 92 वर्ष की उम्र में फिर सत्ता शिखर पर पहुंच गए हैं। महातिर मोहम्मद दुनिया के सबसे बुजुर्ग प्रधानमंत्री बन गए हैं। उनकी अभूतपूर्व विजय की दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने जिस विपक्ष को कुचला था, उसी को साथ लेकर वह इस बार चुनाव लड़े और जीत हासिल की है। वह 16 जुलाई 1981 से 31 अक्तूबर 2003 तक मलेशिया के प्रधानमंत्री रहे। 22 वर्ष लम्बे शासन में उन पर विरोधियों को प्रताड़ित करने और कुचलने के खूब आरोप लगे थे। कभी उनकी गितनी दुनिया के तानाशाह शासकों में होती थी। उन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के कई आरोप लगे। उन्होंने 1987 में सुरक्षा कारणों के आधार पर विपक्षी नेताओं को बिना मुकद्दमे के जेल भेेज दिया था।

सवाल यह है कि मलेशिया की जनता ने उन्हें पुनः क्यों चुना? उनके शासन को लेकर कुछ लोगों की आशंकाएं बरकरार हैं लेकिन अधिकांश लोगों का कहना है कि अगर वह अपने वादे के मुताबिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाते हैं ताे देश में हालात बेहतर हो सकते हैं। मले​िशया की आबादी में 60 फीसदी मलय मुसलमान हैं बाकी 40 फीसदी चीनी और भारतीय मूल के लोग हैं। महातिर के विपक्षी गठबंधन को चुनाव में 115 सीटों पर जीत हासिल हुई है। दूसरी तरफ बीएन और उसकी प्रमुख पार्टी संयुक्त मलेशिया राष्ट्रीय संगठन 1957 में ब्रिटेन से आजादी मिलने के साथ ही सत्ता पर काबिज थी लेकिन बीते कुछ वर्षों से उसकी लोकप्रियता में भारी गिरावट देखने को मिल रही थी। इस बार उसे केवल 79 सीटें ही मिलीं। महातिर निवर्तमान प्रधानमंत्री नजीब रजाक के राजनीतिक गुरु माने जाते हैं लेकिन सियासत में कभी-कभी शिष्य ही राजनीतिक गुरुओं को पछाड़ते रहे हैं। नजीब रजाक ने यह कहते हुए राजनीतिक गुरु महातिर से नाता तोड़ लिया था कि जो पार्टी भ्रष्टाचार को समर्थन दे उसके साथ रहना अपमानजनक है। महातिर ने इस बार अपनी पुरानी पार्टी यूनाइटेड मलय नेशनल आर्गेनाइजेशन को ललकारा और पुरानी गलतियों के लिए माफी भी मांगी।

कभी महातिर ने पार्टी में अपने धुर विरोधी नेता अनवार इब्राहिम को अप्राकृतिक यौनाचार के आरोप में जेल भेजा था। अनवार इब्राहिम की रिहाई के बाद उन्होंने उससे सुलह कर ली। 1997 में दक्षिण पूर्व एशिया में आए वित्तीय संकट से निपटने के सरकारी तरीकों का इब्राहिम ने जमकर विरोध किया था, जिसकी वजह से महातिर ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। महातिर और इब्राहिम नजदीक आए आैर नजीब रजाक से छुटकारा पाने के लिए एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। नजीब रजाक सरकार पर भी भ्रष्टाचार और जनता के धन के गलत इस्तेमाल का आरोप है। महातिर चाहते थे कि देश की अर्थव्यवस्था सुधरे और सत्ता में एकाधिकार खत्म हो।

मलेशिया के चुनावों में महातिर के गठबंधन को बहुमत मिला है। उसका वादा था कि सत्ता में आते ही जीएसटी की दर 6 फीसदी से 4 प्रतिशत कर दी जाएगी आैर सालभर के भीतर जीएसटी समाप्त कर देंगे। जीएसटी चुनावों में एक बड़ा मुद्दा था। मलेशिया के राजस्व का 40 फीसदी हिस्सा तेल से आता था मगर तेल के दाम गिरने से यह घटकर 14 फीसदी रह गया। इस वक्त राजस्व का 18 फीसदी जीएसटी से आता है। मलेशिया की सरकार ने जीएसटी लागू ​​की तो वे लोगों भी टैक्स देने लगे जो अभी तक दायरे से बाहर थे। ऐसे लोगों की आमदनी तो बढ़ी नहीं मगर जीएसटी ने उनकी कमाई पर हमला बोल दिया। इससे महंगाई भी बढ़ी और सरकार से अपेक्षा भी ​िक जब वे हर बात पर टैक्स दे रहे हैं तो सुविधाएं कहां हैं। नतीजा यह रहा कि नजीब रजाक सरकार हार गई। भारत में जीएसटी लागू होने के बाद ऐसा देखने को नहीं मिल रहा। जीएसटी की समस्या को भारत में सिर्फ व्यापारियों की समस्या के तौर पर देखा जाता है लेकिन जनता के नजरिये से इसे अभी तक देखा ही नहीं गया। मलेशिया में तो जीएसटी की विदाई लगभग तय है।

मलेशिया में चुनाव परिणाम में उठापटक को लेकर राजनीतिक पंडित हैरान हैं। महातिर ने देश के भ​िवष्य को बेहतर बनाने के लिए नए वादे किए हैं। बेहतर, निष्पक्ष, स्वतंत्र और एकजुट सरकार देने का वादा उन्होंने किया है। महातिर ने कहा है कि वह किसी से बदला नहीं लेने जा रहे, हम कानून का शासन बहाल करना चाहते हैं। निश्चित रूप से एक पूर्व तानाशाह ने गलतियों से सबक लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी आस्था व्यक्त की है। महातिर के विपक्षी गठबंधन की जीत मलेशिया में एक राजनीतिक भूकम्प की तरह है। देखना होगा कि महातिर ‘ओल्ड इज गोल्ड’ साबित होंगे या नहीं।