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संपादकीय

राजनीति में विपक्ष का विलोप!

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देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल की तुलना पिछले 72 वर्षों की स्वतन्त्र भारतीय राजनीति के किसी भी कालखंड से नहीं की जा सकती है। इसकी असली वजह राजनीति में बहुविविधता का लगातार सिकुड़ते जाना है, जो विचार वैविध्यता को संकीर्णता के दायरे में बहुत करीने से ला रहा है। वास्तविकता यह भी है कि राजनीति आर्थिक कारकों से भी निर्देशित होती है और जब समूचा राजनीतिक तन्त्र इस बात पर सहमत हो जाता है कि उसकी आर्थिक सोच एक विशेष सिद्धांत से ही प्रतिपादित होगी तो राजनीतिक वैविध्यता सिमटने लगती है। 

वर्तमान सन्दर्भों में बाजार मूलक अर्थव्यवस्था पूरे विश्व का अकेला मन्त्र हो चुका है अतः पश्चिमी यूरोप के विकसित देशों से लेकर अर्ध विकसित अफ्रीकी देशों और नवोत्थान में लगे भारत या ब्राजील जैसे देशों से लेकर कम्युनिस्ट चीन या रूस आदि तक में राजनीति एक ही धारा में बहती नजर आ रही है और यह धारा निःसन्देह रूप से राष्ट्रवाद की धारा कही जा सकती है, परन्तु भारत के सन्दर्भ में यह राजनीतिक परिवर्तन अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इस देश को साम्राज्यवाद से मुक्ति दिलाने वाली पार्टी कांग्रेस का क्षरण पिछले पांच वर्ष में जिस तेज गति से हुआ है उसका दूसरा उदाहरण किसी अन्य तीसरे लोकतान्त्रिक देश में नहीं मिलता। 

सत्ता में राष्ट्रवादी समझी जाने वाली पार्टी भाजपा के आने के बाद कांग्रेस के राजनीतिक विमर्श का तिरस्कार भी सबसे पहले इस पार्टी के नेताओं ने ही किया और आम जनता के बीच राजनीति को बाजार की ताकतों के ऊपर छोड़ने का जोखिम तब लिया जबकि लोकतन्त्र में धन की महत्ता को ‘जन महत्ता’ से ऊपर प्रतिष्ठापित किये जाने के गंभीर प्रयास हो रहे थे। इस स्थिति का लाभ सबसे पहले उन ताकतों ने उठाया जो भारत की सामाजिक कलह को अपनी राजनीतिक सम्पत्ति में तब्दील करना चाहती थीं। धन सत्ता का सीधा अर्थ राजनीति के कार्पोरेटीकरण से था और इसकी शुरूआत जाने-अंजाने श्रीमती इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे स्व. राजीव गांधी ने कर डाली थी। कार्पोरेटीकरण केवल सांकेतिक नहीं था बल्कि उसने सत्ता के रणनीतिक केन्द्रों को अपना ठिकाना बनाने की गोटियां बिछाने में सफलता प्राप्त करने की ठान ली थी।

इसकी पहली शर्त यह थी कि राजनीति सामान्य व्यक्ति की प्रतिभा से बाहर संभ्रान्त व सम्पन्न कहे जाने वाले लोगों की बपौती बना दी जाये। लोकतान्त्रिक राजनीति में विचार की जगह चकाचौंध को स्थापित किया जाये और इससे जुड़े लोगों को महिमामंडित करते हुए उन्हें जनप्रतिनिधि का ताज पहनाया जाये। भारत में सामाजिक कलह की शिकार रही पिछड़ी जातियां या दलित जातियां इस समीकरण में स्वतः ही अपना पृथक बोध स्थापित करती चलीं जिसकी वजह से ​इन्हीं को इकट्ठा करके जब कुछ जातिगत राजनीतिक दलों का गठन हुआ तो सत्ता पर अधिकार के लिए जातियों में युद्ध तेज होता गया और इस लड़ाई में विचार के स्थान पर व्यक्ति आते चले गये। 

पारिवारिक राजनीति के पनपने की एक खास वजह यह भी रही जिससे कांग्रेस जैसी पार्टी का क्षरण स्वाभाविक रूप से होता चला गया और इसके स्थान पर राष्ट्रवाद की प्रवर्तक बनी भाजपा बहुत आसानी के साथ सत्ता की तरफ बढ़ने लगी परन्तु भाजपा ने राष्ट्रवाद का पर्याय जिस तरह भारत की भौगोलिक व संघीय शक्ति को बनाया वह बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के चलते सबसे ज्यादा कारगर इसलिए हुआ क्योंकि इस प्रणाली में किसी भी राजनीतिक विचारधारा का कोई खास  लेना-देना नहीं था। सब कुछ बाजार की ताकतों पर छोड़ कर ही विकास का काम किया जाना था।

इस नीति की प्रवर्तक स्वयं कांग्रेस ही थी अतः भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रवाद के बीच बहुत बड़ा अंतर भी लोगों को नजर नहीं आया। अब हालत यह हो गई है कि कांग्रेस पार्टी में कोई ऐसा नेता नजर ही नहीं आ रहा है जो प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के बराबर आकर खड़ा हो सके? इसकी वजह भी राजनीति से विचारधारा का दरकिनार होना है। संसदीय लोकतन्त्र में मजबूत विपक्ष का होना इसलि​ए बहुत जरूरी होता है जिससे बहुमत में आने वाली पार्टी की सरकार पर लगातार यह दबाव बना कर रखा जा सके कि उसकी नीतियां केवल जन कल्याण की दृष्टि से ही बनाई जाएं। इस काम में बहुमत पाने वाला दल जरा सी भी कोताही नहीं बरत सकता। ऐसा स्वतन्त्र भारत के शुरू के पांच दशकों तक होता रहा है। 

बेशक कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी परन्तु छोटी-छोटी संख्या में आने वाले जनसंघ, संसोपा, स्वतन्त्र पार्टी आदि राजनीतिक दल लगातार सरकार को अपने तर्कों से दबाव में रखते थे। अब ऐसी स्थिति समाप्त होती जा रही है बल्कि इस कदर बदतर हो चुकी है कि चुनावों से पहले ही आंख मींच कर भविष्यवाणी की जा सकती है कि सत्ता में फिर से भाजपा ही आयेगी। महाराष्ट्र व हरियाणा में विधानसभा चुनाव परिणामों के बारे में यही कहा जा रहा है। यह स्थिति अचानक तो नहीं आयी है? इसकी असली वजह क्या हो सकती है?  

इस बारे में  गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। दुखद तो यह भी कम नहीं है कि देश की ​आर्थिक स्थिति के बारे में चारों तरफ से चेतावनियां मिल रही हैं परन्तु प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस अपने भीतर के झगड़े सुलझाने में लगा हुआ है। हर राज्य में इसके नेता आपस में ही उलझ रहे हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर इनके विचारों में समानता नहीं है। कश्मीर जैसे विषय पर इसके नेता एक-दूसरे के उलट बयान देते रहते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत की जनता को ही हो रहा है।