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राजस्थान में सियासी तूफान!

लोकतन्त्र में निजी आकांक्षा प्रत्येक राजनीतिज्ञ की होती है और इस तरह होती है कि प्रत्येक राजनीतिज्ञ प्रधानमन्त्री बनना चाहता है। इस बारे में स्व. बाबू जगजीवन राम का वह कथन आधुनिक राजनीतिक इतिहास का शिलालेख है, जिसमें एक विदेशी पत्रकार के यह पूछने पर कि भारतीय राजनीतिज्ञ सत्ता के इतने भूखे क्यों होते हैं? बाबू जी ने उत्तर दिया था, ‘‘जिस राजनीतिज्ञ में सत्ता में बैठने की लालसा न हो उसका राजनीति में आने का कोई मतलब नहीं है ( ही हैज नो बिजनेस टू बी इन पा​लिटिक्स​​​)। मगर इसके साथ उन्होंने यह भी कहा था कि लोकतन्त्र में सत्ता में आने की लालसा पार्टी अनुशासन और मर्यादा व नैतिकता का पालन करते हुए रखी जानी चाहिए। प्रत्येक राजनीतिज्ञ को प्रधानमन्त्री तक बनने की आकांक्षा अपने भीतर रखनी  चाहिए जिससे वह अधिकाधिक योग्य और कुशल बन सके और देश कभी भी नेतृत्व क्षमता से खाली न हो सके।’’ लोकतन्त्र लोकलज्जा व लिखित नियमों व अलिखित परंपराओं व नजीरों से चलता है।  लिखित नियम है कि दलबदल कानून के सभी उपबन्ध विधायकों पर लागू होंगे जिससे बीच में ही जनादेश के साथ छल न हो सके मगर इसका तोड़ इस्तीफा टैक्नोलोजी से निकाला गया। अब इस्तीफा टैक्नोलोजी का तोड़ अशोक गहलोत ने राज्य सरकार को अस्थिर करने के उपबन्धों से निकाला है जो कानूनन  सरकार को अस्थिर करने का प्रयास राजद्रोह की श्रेणी में आता है और इसका षड्यन्त्र रचने के जुर्म में बाकायदा कार्रवाई का प्रावधान है। अतः राजस्थान के सियासी तूफान के इस पहलू को हमें ध्यान से देखना होगा जिसमें प्राथमिक सिद्धान्त निजी आकांक्षा पर पार्टी हित और पार्टी हित पर राष्ट्रीय हित रहेगा।

राजनीतिक रूप से शान्त और स्थिर रहने वाले राजस्थान में जिस तरह का सियासी तूफान उठा है उसका मुख्य कारण पार्टी हित से ऊपर निजी महत्वाकांक्षा का होना है। संसदीय लोकतन्त्र की राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्था दो प्रमुख स्तम्भों पर चलती है।  निजी हित से ऊपर पार्टी हित और पार्टी हित से ऊपर राष्ट्र हित, परन्तु कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के पीढ़ीगत बदलाव के नाम पर जिस प्रकार ‘नौबहार’ कांग्रेसी सीधे सत्ता के शिखर पर पहुंच कर पार्टी की एक सदी से पुरानी संस्कृति और परंपराओं को अपने पारिवारिक आभा मंडल से फीका कर देने की फिराक में  अनुभवी व दूरदर्शी नेताओं को हाशिये पर फैंकने की लालसा में पार्टी तक को ह​ाशिये पर डालने से पीछे नहीं रहते, उसी का परिणाम है कि आज राजस्थान में मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत को अपनी सरकार को बचाने के लिए अपने ही उपमुख्यमन्त्री सचिन पायलट से सामना करना पड़ रहा है।

दल-बदल कानून का जिस तरह विभिन्न राज्यों में मजाक बना कर सरकारें उलट-पलट की गई हैं उस पर ‘ब्रेक’ लगाने का उन्होंने यह नुस्खा ढूंढा है। बहुमत की सरकारों को ‘साम-दाम-दंड-भेद’ से गिरा कर चुनावों में अल्पमत में आयी पार्टी की सरकार गठन करने का जो ‘फैशन’ पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न राज्यों में पनपा है उससे दलबदल कानून की उपयोगिता ही समाप्त हो गई थी और यह सन्दर्भहीन बनता जा रहा था।  इस कानून की गिरफ्त में आने से बचने के लिए नई ‘इस्तीफा तकनीक’ को ईजाद किया गया। विधानसभा की सदस्य शक्ति ही घटा कर इस तरह कम कर दी जाये कि कल तक का सत्तारूढ़ दल अल्पमत में आ जाये। 

लोकतन्त्र में  वास्तव में यह जनादेश का ही अपहरण है क्योंकि चुनावों में आम मतदाता अपनी बुद्धि के अनुसार राजनीतिक दलों का चुनाव करता है और किसी एक पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश देता है।  यह जनादेश सिद्धांततः पांच वर्ष के लिए होता है। इस दौरान यदि जनता द्वारा सत्ता व विपक्ष में भेजे गये विधायक पाला बदल करते हैं तो वे जनता के साथ विश्वासघात करते हैं। इसी को रोकने के लिए 1986 में दल-बदल कानून बनाया गया था। जिसके तहत अब किसी भी  पार्टी के दो-तिहाई विधायक ही इकट्ठा होकर पाला बदल सकते हैं, परन्तु मध्य प्रदेश में जिस तरह कांग्रेस पार्टी के 22 विधायकों ने इस्तीफा दिया उसके पीछे इसी पार्टी के एक जमाने में युवा नेता कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिन्धिया का हाथ था। वह अपनी पूर्व रियासत ग्वालियर से मध्यप्रदेश की सरकार चलाना चाहते थे और अपने पुराने राजपरिवार की रवायतों के हसीन ख्वाबों काे ताजा करना चाहते थे।

बेशक उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भाजपा से मिल गई है मगर इसके लिए उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी की पूरी मध्यप्रदेश की सरकार ही दांव पर लगा दी। ठीक ऐसा ही व्यवहार राजस्थान में यदि सचिन पायलट का भी करने का इरादा है तो अशोक गहलोत ने ‘उड़ती चिड़िया को पहले ही हल्दी’  लगा कर साफ कर दिया है कि राजनीति में हर चाल का तोड़ होता है। वह राजनीतिज्ञ ही क्या जो हर चाल की काट अपने पास न रखता हो। सचिन भी अपने पिता स्व. राजेश पायलट की वजह से ही राजनीति में आये और कांग्रेस ने इतनी युवावस्था में ही उन्हें राजस्थान जैसे राज्य का उपमुख्यमन्त्री बना दिया। उनकी काबलियत सिर्फ यह है कि वह राजेश पायलट के बेटे हैं।  राजनीति में उनका इतना ही योगदान है। यह गलतफहमी पालने की जरूरत नहीं है कि 2018 में राजस्थान की जनता ने जो कांग्रेस के पक्ष में जनादेश दिया था उसमें प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनका बहुत बड़ा योगदान था।  2018 का चुनाव भाजपा की मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे सिन्धिया के कुशासन के खिलाफ था। लोगों में इस शासन के प्रति जबर्दस्त गुस्सा था। जिसका इजहार चुनावों में होना पक्का था। अतः सचिन पायलट को अपने हित से पहले लोकतंत्र की उस भावना के अनुरूप काम करना होगा जिससे यह लगे कि केवल निजी महत्वकांक्षा की खातिर वह मुख्यमंत्री के साथ लाग-डांट में नहीं लगे हैं। क्योंकि पार्टी ने ही उन्हें सत्ता के इस मुकाम तक पहुंचाया है। 2018 में राजस्थान की जनता ने जनादेश कांग्रेस पार्टी को दिया था, अतः पार्टी हित और निजी हित में चुनाव करने में सचिन पायलट को बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए तथा अपने पिता की राजनीति का अनुसरण करना चाहिए। 


आदित्य नारायण चोपड़ा

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