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संपादकीय

सिनेमा का राजनीतिकरण

भारतीय सिनेमा मनोरंजन का विशुद्ध साधन है। अनेक दशकों से लोग अपने प्रिय नायकों और नायिकाओं के दीवाने हैं। दर्शक आज भी अपने प्रिय अभिनेताओं की फिल्में देखने टिकट खिड़की पर पहुंच जाते हैं। दक्षिण भारत में तो दीवानगी का यह आलम है कि दर्शक सबसे पहले शो की टिकट खरीदने के लिये रात के समय ही थियेटर के बाहर कतार लगाकर बैठ जाते हैं। आज के परिवेश में बहुत कुछ बदल गया है। सबसे बड़ा सवाल तो सामने आ खड़ा हुआ है कि क्या अब फिल्मों का राजनीतिकरण किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि राजनीति पर फिल्में पहले नहीं बनती थीं। कई फिल्में कांग्रेस शासनकाल में राजनीति का शिकार भी बनीं। इसमें अमृत नाहटा की किस्सा कुर्सी का और संजीव कुमार और अभिनेत्री अपर्णासेन अभिनीत फिल्म ‘आंधी’ शामिल हैं। किस्सा कुर्सी का फिल्म की दहशत तो इतनी थी कि इस फिल्म के प्रिंट ही नष्ट कर दिये गये थे। आंधी फिल्म का प्रदर्शन इसलिये रोका गया था क्योंकि यह फिल्म इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित बताई गई थी।

राजनीति की विफलताओं पर करारा प्रहार करती फिल्मों को लेकर विवाद भी हमेशा रहे हैं लेकिन इनका असर कुछ देर तक ही रहा। अब तो ऐसा लगता है कि फिल्मों, टीवी धारावाहिकों में राजनीति की घुसपैठ इतनी जबरदस्त ढंग से हो चुकी है कि दर्शक सोचने को विवश हैं कि वह आखिर देखें तो क्या देखें और अगर देखें तो क्यों देंखे। फिल्मों के प्रदर्शन को रोकने के लिए अदालती जंग जारी है। एक तरफ फिल्मों में एक दल अपनी राजनीतिक विचारधारा पर प्रचार कर रहा है और विपक्षी दल पर करारी चोट करता ही नजर आ रहा है। दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक दल फिल्म को अपना दुश्मन मानकर उनको प्रतिबन्धित करा देते हैं या उनके प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण है पश्चिम बंगाल सरकार ने अनिक दत्ता की फिल्म ‘भविष्योतेर भूत’ का प्रदर्शन असंवैधानिक तरीके से रुकवा दिया।

फिल्म 15 फरवरी को रिलीज तो हुई लेकिन 16 फरवरी को ही यह फिल्म सिनेमाघरों से उतार ली गई। इस फिल्म में भूतों का एक समूह एक शरणार्थी शिविर में इकट्ठा होता है और वर्तमान समय में प्रासंगिक होने का प्रयास करता है। ऐसा किये जाने के पीछे मुख्य कारण यह रहा है कि इस फिल्म में राजनीतिक व्यंग्य का सहारा लेकर अलग-अलग पार्टियों को कठघरे में खड़ा किया गया है जिसमें तृणमूल कांग्रेस भी शामिल है। ममता दीदी की तृणमूल सरकार ने लोकतांत्रिक परंपराओं और कानूनी व्यवस्था की परवाह न करते हुए सीधे फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन काे बाधित करने की कोशिश के लिये पश्चिम बंगाल सरकार को फटकार लगाते हुए उस पर 20 लाख का जुर्माना लगा दिया।

क्या लोकतंत्र में कोई सरकार, राजनीतिक पार्टी या अन्य समूह सिर्फ इसलिये किसी फिल्म को प्रतिबन्धित कर सकता है कि उससे किसी राजनीति की हकीकत पर चोट पहुंचती है। अब फिल्मों में बायोपिक फिल्मों के नाम पर छद्म जीवनी का फिल्मांकन राजनीतिक उद्देश्यों के लिये किया जा रहा है। बाल ठाकरे के जीवन पर बनी फिल्म दा एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर का उद्देश्य यूपीए के दस वर्ष के शासनकाल की पोल खोलना और चुनावों से पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के पक्ष में भावनात्मक माहौल तैयार करना ही था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बायोपिक का प्रदर्शन तो चुनाव आयोग ने रोक दिया है। सवाल किसी पार्टी विशेष का नहीं बलिक सत्ता के चरित्र का है। भारत का लोकतंत्र बहुत मजबूत है, तो फिर विरोध या विरोध मात्र की आशंका से राजनीतिक दल भयभीत क्यों हो जाते हैं।

जहां तक उरी-द-सर्जिकल स्ट्राइक फिल्म का सवाल है, अगर कोई फिल्म सेना के शौर्य का प्रदर्शन करती है या राष्ट्रवाद की भावना ​का प्रसार करती है तो मैं समझता हूं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। देश में हर किसी को राजनीति की हकीकत पर चोट करने का अधिकार है। अभिव्य​कित की स्वतंत्रता का गला नहीं घोंटा जाना चाहिए। दूसरी तरफ यह भी देखा जाना चाहिए कि फिल्मों का उद्देश्य तटस्थता के सिद्धांत के साथ अपनी बात रखना ही होना चाहिए। दुर्भाग्य है कि फिल्मों ने तटस्थता का सिद्धांत ही छोड़ दिया है। राजनीतिक घटनाक्रमों को तटस्थता से ही दिखाया जाना चाहिए। अब मैं एक नई फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ की चर्चा करना चाहूंगा। हिन्दी फिल्मों में कई वामपंथी रुझान वाले निर्देशकों ने अतिशयोक्ति को हथियार बनाकर सिनेमा रचा है। उनकी फिल्मों में राजनीति का अक्स भी देखा गया लेकिन अगर कोई फिल्म किसी एक विचारधारा का प्रचार बन जाये तो फिल्म अपना असर गंवा बैठती है।

फिल्मों के जरिए सवाल उठाना जायज है लेकिन विपक्ष को निशाने पर रखना और एक विचारधारा की श्रेष्ठता साबित करना असरदार नहीं रहता। इस फिल्म का उद्देश्य लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत के लिये इन्दिरा गांधी को जिम्मेदार ठहराना ही रहा। शास्त्री जी की मौत को लेकर सवाल तो उनकी मृत्यु के बाद से ही उठाये जाते रहे हैं। राजनीति पर फिल्में अमेरिका में भी बनती हैं। ओबामाज़ अमेरिका और ​हिलेरीज़ अमेरिका- द सीक्रेट हिस्ट्री आफ डेमोक्रेटिक पार्टी जैसी फिल्में बन सकती हैं तो भारत में ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनती हैं। आखिर करें तो क्या करें, यहां तो पद्मावत जैसी फिल्मों पर भी सियासत हो जाती है। तटस्थ और सशक्त राजनीतिक फिल्मों की शुरूआत तो की ही जानी चाहिए।