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राष्ट्रपति और संसद के तार

भारतीय लोकतन्त्र में राष्ट्रपति के पद को लेकर यह अवधारणा पूरी तरह तथ्यों के विपरीत है कि देश के राष्ट्र प्रमुख को संविधान मंे केवल शोभा के लिए रखा गया है और वह केवल फोटो खिंचवाने के लिए हैं। बिना शक वह कार्यकारी राजप्रमुख नहीं हैं और यह कार्य प्रधानमन्त्री के जिम्मे है मगर संसद से लेकर मन्त्रिमंडल तक सब उन्हीं ही की निगेहबानी में कार्य करते हैं और राष्ट्रपति पद में प्रदत्त संविधान की शक्ति से अधिकार लेकर अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। इसका मूल कारण यह है कि भारत का राष्ट्रध्यक्ष ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष की तरह वंशानुगत राजसी परंपरा से असीमित समयावधि के लिए नियुक्त नहीं होता है बल्कि आम जनता द्वारा चुने गये जन प्रतिनिधियों द्वारा पांच वर्ष के लिए निर्वाचित होता है।

राष्ट्रपति को संविधान के संरक्षक के रूप में भारत में पदस्थापित करने का अर्थ भी शोभा की खातिर कदापि नहीं है क्योंकि देश के किसी भी राज्य में संविधान के अनुरूप शासन होते देखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी होती है जिसके लिए प्रत्येक राज्य में राष्ट्रपति भवन के दूत के रूप में राज्यपाल नियुक्त होते हैं। इनका चुनाव नहीं किया जाता बल्कि नियुक्ति की जाती है जिसकी समयावधि राष्ट्रपति की किसी भी राज्यपाल में विश्वास और प्रसन्नता पर निर्भर करती है। हालांकि हर राज्य में विधि अनुसार चुनी हुई सरकार होती है जिसका मुखिया मुख्यमन्त्री होता है जो राज्य के सदन विधानसभा द्वारा राजनीतिक बहुमत के आधार पर चुना जाता है परन्तु राज्यपाल राष्ट्रपति के दूत के रूप में किसी भी मुख्यमन्त्री को संविधान के दायरे से बाहर जाकर काम करने की आशंका पर ही लगाम कस देने के लिए बाध्य होता है। केन्द्र के मामले में यह कार्य स्वयं राष्ट्रपति करते हैं।

राष्ट्रपति यह कार्य संसद के माध्यम से ही करते हैं क्योंकि वह संसद के महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो खूबसूरत व्यवस्था हमें सौंपी है उसमें हर कदम पर शानदार कशीदाकारी करके सुनिश्चित किया गया है कि हर परिस्थिति में जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों के वैध अधिकारों की सुरक्षा हो। इन्हीं वैध अधिकारों में से एक संसद के भीतर सरकार की सीधी जवाबतलबी भी प्रमुख है जिसका निष्पादन संसद के भीतर ही संभव होता है और राष्ट्रपति ही इसका सत्र बुलाने के लिए अधिकृत होते हैं। बिना शक वह यह कार्य अपने द्वारा नियुक्त प्रधानमन्त्री के मन्त्रिमंडल की अनुशंसा पर ही करते हैं मगर इसमें अकारण बदलाव या अनावश्यक फेर-बदल पर उन्हें यह अधिकार है कि वह सरकार से एेसा किये जाने का कारण पूछ सकें। संसद के शीतकालीन सत्र को गुजरात चुनावों के मद्देनजर जिस तरह टाला जा रहा है उससे इसमें चुने हुए सांसदों के वैध अधिकारों पर अंकुश का भाव परोक्ष रूप से प्रकट हो रहा है क्योंकि विपक्ष के सांसद लगातार मांग कर रहे हैं कि शीतकालीन सत्र को लटकाने का औचित्य किसी राज्य में होने वाले चुनावों को देखते हुए नहीं ठहराया जा सकता।

हमारे संविधान में स्पष्ट रूप से केन्द्र-राज्य सम्बन्धों को परिभाषित किया गया है और राज्यपाल के पद के सृजन के पीछे असली मंशा भी यही थी। संविधान सभा में इस मुद्दे पर लम्बी बहस भी हुई थी। दूसरा सबसे प्रमुख यह तथ्य है कि किसी भी राज्य के चुनाव में केन्द्र सरकार का कोई भी मन्त्री सरकारी हैसियत से नहीं बल्कि राजनैतिक दल के प्रतिनि​िध के रूप में ही चुनाव प्रचार कर सकता है। यह पूरी तरह राजनीतिक कार्य है। इस राजनीतिक कार्य के लिए कोई भी सरकार अपने मुख्य दायित्व प्रशासनिक कार्यों से मुंह कैसे मोड़ सकती है? सरकारों का काम चुनाव जीतना या हारना नहीं होता बल्कि राजनीतिक दलों का होता है। असल में किसी भी राज्य में चुनाव कराने की मुख्य जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है। राज्य के सन्दर्भ में चुनाव आयोग वहां की परिस्थितियों और तत्सम्बन्धी प्रशासनिक जिम्मेदारियों को निभाने की दक्षता के अनुसार चुनाव की तारीखों की घोषणा करता है। किसी भी सूरत में संसद के सत्र का संज्ञान लेना उसके लिए जरूरी नहीं होता क्योंकि विधानसभा चुनावों का स्वतन्त्र मानक होता है।

चुनाव आयोग भी सीधे राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होता है क्योंकि इसके सदस्यों की नियुक्ति वही करते हैं। यह आयोग किसी भी राजनीतिक दल की प्रतिष्ठापित सरकार से पूरी तरह निरपेक्ष रह कर अपना कार्य पूरी तरह गैर या अराजनैतिक नजरिये से करने के लिए बाध्य होता है। इसका काम किसी भी राजनैतिक दल की सुविधा का ध्यान रखना नहीं होता। मगर इसकी कार्यशैली पर भी अभी सवाल खड़े हो गये हैं। लोकतन्त्र के लिए यह चिन्ता की बात है। इसकी निष्पक्षता भारत के घनघोर राजनीतिक दल मूलक लोकतन्त्र में न केवल होनी चाहिए बल्कि दिखनी भी चाहिए। इसके लिए एक ही उदाहरण देना चाहूंगा जो हमेशा सामयिक रहेगा। 1969 मंे जब स्व. इंदिरा गांधी ने अपनी कांग्रेस पार्टी का विघटन किया तो उसका चुनाव निशान दो बैलों की जोड़ी लेने के लिए इंदिरा जी की मुखालिफ कांग्रेस ( संगठन) पार्टी ने इस चुनाव निशान को लेने के लिए भी तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एसपी सेनवर्मा के कार्यालय में दरख्वास्त लगाई। इंदिरा जी प्रधानमन्त्री थीं।

मगर स्व. सेनवर्मा ने यह चुनाव चिन्ह ही जाम कर दिया। एेसा पुनः 1979 में कांग्रेस के पुनः टूटने पर भी हुआ और तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी 1969 के फैसले का अनुसरण किया। चुनाव आयोग कोई छोटा-मोटा संस्थान नहीं है बल्कि यह इस देश के लोकतन्त्र का सबसे प्रमुख आधार स्तम्भ है। इसकी निष्पक्षता पर ही पूरा वह ढांचा खड़ा हुआ जिससे संसद और विधानसभाएं गठित होती हैं। अतः इसका इकबाल किसी भी सूरत में कम करके नहीं परखा जाना चाहिए। यकीनी तौर पर राष्ट्रपति की ही जिम्मेदारी बनती है कि वह संविधान के संरक्षक के रूप में सब तरफ चौकसी बरतें लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि विपक्षी दल किसी भी मुद्दे को तिल का ताड़ बना कर पेश न करें और कोई भी सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में भी झांक कर जरूर देखें।