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क्रिप्टो करेंसी पर नियामक तंत्र

क्रिप्टो करेंसी को लेकर फिर से खूब चर्चा चल रही है। एक तरफ कर्नाटक के बिटक्वॉइन घोटाले का शोर सुनाई दे रहा है तो दूसरी तरफ निवेशक इस ओर आकर्षित हो रहे हैं। क्रिप्टो करेंसी दो शब्दों से मिलकर बना शब्द है जो कि लैटिन भाषा का शब्द है। जिसका मतलब होता है, छुपा हुआ पैसा या डिजिटल रुपया। क्रिप्टो करेंसी भी एक तरह से डिजिटल पैसा है, जिसे आप छू तो नहीं सकते लेकिन रख सकते हैं। यह किसी सिक्के या नोट की तरह ठोस रूप से आपकी जेब में नहीं होता। यह पूरी तरह आनलाइन होता है। ​क्रिप्टो करेंसी  की शुरूआत किसने की इस संबंध में कोई स्टीक जानकारी नहीं है, बहुत सारे लोग मानते हैं कि क्रिप्टो करेंसी 2009 में सतोशी नाकामोतो ने शुरू किया था। इससे पहले भी कई निवेशकों ने या देश ने डिजिटल मुद्रा पर काम किया था। अमेरिका ने 1996 में मुख्य इलैक्ट्रानिक गोल्ड बनाया था, ऐसा गोल्ड जिसे रखा नहीं जा सकता था लेकिन इससे दूसरी चीजें खरीदी जा सकती थीं। हालांकि 2008 में इसे बैन कर दिया गया था। डिजिटल मुद्रा पर किसी देश या सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। शुरूआत में इसे अवैध करार दिया गया था लेकिन बिटक्वॉइन की बढ़ती लोकप्रियता के चलते इसे कई देश लीगल कर चुके हैं। कुछ देश अपनी खुद की आयामी मुद्रा ला रहे हैं।

बिटक्वॉइन इस समय दुनिया की सबसे महंगी वर्चुअल करेंसी है। बिटक्वॉइन करेंसी के लिए न कोई बैंक है, न एटीएम। अभी तक धोखाधड़ी के मामलों काे देखते हुए इसे अब तक अधिकृत नहीं किया गया, फिर भी भारतीय इसके मायाजाल में पड़ चुके हैं। बैंकों के जो नियम कायदे अवैध लेन-देन में आड़े आते हैं, उसे अपराधी क्रिप्टो करेंसी से अंजाम देते हैं। क्रिप्टो करेंसी का लेन-देन एक कोड और पासवर्ड के जरिये किया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी मुद्रा का अवैध तरीके से रकम एक जगह से दूसरी जगह भेजने में किया जा रहा है। इस समय एक बिटक्वॉइन की कीमत भारत की मुद्रा में 45 लाख के लगभग है। करीब डेढ़ वर्ष पहले तक इसकी कीमत साढ़े चार लाख रुपए थी लेकिन इसका चलन बढ़ने से इसमें दस गुणा उछाल आ गया। अनेक लोग तो घर बैठे लखपति बन गए। भारत में कोरोना काल के दौरान ही ऐसी मुद्रा पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा छिड़ गई थी लेकिन भारतीय बड़ी संख्या में क्रिप्टो करेंसी खरीद रहे हैं लेकिन इसे लेकर कोई आधिकारिक डाटा नहीं है। लोग मुनाफा कमाने के ​िलए पैसा बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। 

क्रिप्टो करेंसी को लेकर वित्तीय मामलों की संसद की स्थाई समिति इस पर विचार कर रही थी। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी चिंतओं से अवगत करा दिया था। 2018 में आरबीआई ने क्रिप्टो करेंसी के लेन-देन का समर्थन करने को लेकर बैंकों और ​विनियमन वित्तीय संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन मार्च 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने आरबीआई ने प्रतिबंध के खिलाफ फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार को कोई निर्णय लेते हुए इस मामले पर कानून बनाना चाहिए। फिर आरबीआई ने कहा था कि वे भारत की खुद की क्रिप्टो करेंसी को लाने और उसके चलन को लेकर विकल्प तलाश रहे हैं।

संसदीय समिति ने पाया कि डिजिटल करेंसी में निवेश पर राेक लगाना सम्भव ही नहीं। हालांकि बैठक में इस बात पर सहमति बनती दिखाई दी कि क्रिप्टो करेंसी के नियमन के लिए एक रेग्यूलेटरी मैकेनिज्म तैयार किया जाए। बैठक के दौरान सांसदों ने निवेशकों की पूंजी की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएं भी समिति के सामने रखी। यह भी कहा गया कि क्रिप्टो करेंसी में निवेश करना या नहीं करना निवेशकों का विशेषाधिकार है लेकिन लोगों को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। दरअसल सरकार की योजना नॉन रेग्युलेशन वाले एसेंट्स में पारदर्शिता लाने और निवेशकों को लुभाने के लिए कम्पनियों की ओर से बढ़ा-चढ़ा कर किए जाने वाले दावों पर रोक लगाने की है। 

असल मुद्दा क्रिप्टो करेंसी के आधार वाली ब्लॉक चेन को रक्षा कवच देना है और सरकार ऐसा चाहती है। कोविड-19 के कारण भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सुधार आया है। इंटरनेट की उपलब्धता के कारण डिजिटल पेमेंट में 42 फीसदी की बढ़ौतरी हो चुकी है। जिस मुद्रा पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं उसे लेकर निवेशकों को बहुत सर्तक रहने की जरूरत है। यह बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। ​क्रिप्टो करेंसी देश की वित्तीय प्रणाली को कितना प्रभावित करेगी, इस बात का आकलन किया जाना चाहिए। ​क्रिप्टो करेंसी पर भारत के हर कदम पर दुनिया की नजर है। इस पर​ निवेशकों की नजर है। देखना होगा कि रेग्युलेटरी मैकेनिज्म का प्रारूप क्या होगा?