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पीएफआई की सही जगह

आजादी के बाद  प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने जब कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबन्ध लगाया तो लक्ष्य स्पष्ट था कि अहिंसा की बुनियाद पर अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराये गये हिन्दोस्तान में हिंसा को पनपाने वाली किसी भी विचारधारा वाली राजनैतिक पार्टी को सियासत करने का हक नहीं दिया जा सकता है। भारत ने जो संविधान लिखा उसमें भी साफ था कि केवल शान्तिपूर्ण व पूर्ण अहिंसक तरीके से हर पांच साल बाद होने वाले चुनावों के माध्यम से ही सत्ता में परिवर्तन किया जा सकता है जिसमें प्रत्येक वयस्क नागरिक की सीधी भागीदारी उसे एक वोट के मिले अधिकार से होगी। इतना ही नहीं अक्टूबर 1951 से शुरू हुए भारत के पहले आम चुनावों की प्रक्रिया से पूर्व ही पं. नेहरू ने पहला संविधान संशोधन भी इसी मुतल्लिक करते हुए खुलासा किया कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की सीमा वहीं समाप्त हो जाती है जब कोई व्यक्ति हिंसक विचारों को हवा देने का काम करने लगता है। इसे ही अनुच्छेद 19 की धारा 1(ए) कहा जाता है। पं. नेहरू का यह बहुत ही ऐतिहासिक व दूरगामी प्रभाव डालने वाला फैसला था जिस पर संविधान के निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी सहमति व्यक्त करते हुए कहा था कि स्वतन्त्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को काबिज करने के जोश में वह यह भूल ही गये थे कि हिंसक विचारों के प्रचार-प्रसार का लोकतन्त्र पर क्या असर पड़ सकता है? आज केन्द्र की मोदी सरकार ने पापुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) और उसके आनुषांगिक अन्य आठ संगठनों पर प्रतिबन्ध लगा कर पुनः साबित कर दिया है कि भारत के लोकतन्त्र में हिंसा के बूते पर धार्मिक उग्रवाद फैला कर किसी विशेष सम्प्रदाय को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों व आतंकवाद की तरफ धकेलने वाली किसी भी संस्था का वजूद केवल अहिंसा को ही साध्य मानने वाले इस राष्ट्र में सहन नहीं किया जायेगा। 

पीएफआई जिस तरह से भारत की आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक भारत को इस्लामी देश बनाने के जेहाद की तहरीक के सपने को संजों कर चलना चाहती थी, उससे पंथनिरपेक्ष भारत किसी भी तौर पर नजरें नहीं फेर सकता था क्योंकि हिन्दोस्तान में सीरिया के ख्वाब देखने वालों की करतूतें इस मुल्क की जांच एजेंसियों की नजरों में आ चुकी थीं। ‘गजवा-ए- हिन्द’ का अगर एक भी पैरोकार आज के हिन्दोस्तान में आजाद और खुला घूमता है तो वह पूरे मुल्क की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती की तरह ही देखा जायेगा क्योंकि उसका केवल दिलो-दिमाग ही नहीं बल्कि पूरा जिस्म मजहब की बुनियाद पर इंसानियत के कत्ल की पैरवी करता है। हिन्दोस्तान यह नजारा 1947 में देख चुका है जब एक पंजाबी ने दूसरे पंजाबी का कत्ल किया था और बंगाली ने दूसरे बंगाली को मारा था। वह मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा बोया हुआ बीज था जिसकी फसल उस वक्त मुस्लिम लीग के गुनहगार कारिन्दों ने काटी थी और पाकिस्तान तामीर कराया था।

आजादी के 75 साल बाद भी अगर उसी जिन्ना की जहनियत को हवा देने का काम पीएफआई जैसी तंजीमें करती हैं और मजहब के आधार पर भारतीयों को हिन्दू-मुसलमान में बांट कर इंसानी हुकूकों पर मुल्ला-मौलवियों के पहरे बैठाना चाहती हैं तो जितनी तरक्की भारत ने पिछले 75 सालों में की है उस पर खाक डालने की साजिश को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने के अख्तियार सरकार को इस देश का संविधान ही देता है। इसलिए गृहमन्त्री अमित शाह ने जो फैसला पीएफआई पर प्रतिबन्ध लगाने का किया है उसका समर्थन आगे बढ़ कर सबसे पहले देश की मुस्लिम युवा पीढ़ी को ही करना चाहिए क्योंकि यह तंजीम युवा पीढ़ी को मजहब के नाम पर संगठित करके उन्हें आतंकवादी तंजीमों में शरीक होने के लिए बढ़ावा दे रही थी। भारत में अगर आईएसआईएस, लश्करे तैयबा या अन्य दहशतगर्द तंजीमों में शामिल होने का सामान कोई संस्था मुहैया कराती है तो इसका जवाब भी उसी तर्ज में दिया जाना जरूरी हो जाता है। 

बेशक भारत एक पंथ या धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है, मगर इसका मतलब यह नहीं है कि यह किसी मजहब की मदाखलत इंसानी हकूकों के दायरे में गंवारा करता है। पीएफआई  और इससे जुड़े विद्यार्थी संगठन ने जिस तरह कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब के मसले को धार्मिक अधिकार से जोड़ने की कोशिश की उसके नतीजे में इसने मुस्लिम महिलाओं को पिछली सदियों में धकेलने का काम किया। यह मामला फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है।  

हालांकि कर्नाटक उच्च न्यायालय हिजाब के खिलाफ फैसला दे चुका है, इसलिए इस बारे में तफसील से लिखना इस वक्त मुनासिब नहीं होगा। पीएफआई जैसी तंजीम अगर वन्देमातरम या भारत माता की जय अथवा जय हिन्द की जगह भारतीय मुस्लिमों का कौमी नारा अल्लाह-हो-अकबर बनाना चाहती है तो वह भारत के मुसलमानों को नहीं पहचानती क्योंकि जय हिन्द का नारा भी नेताजी की फौज के ही एक मुस्लिम सैनिक अफसर ने दिया था। जय हिन्द आज भी भारत के हर गली-कूंचे में सरकारी महकमों से लेकर नागरिक सभाओं तक में कौमी सम्बोधन माना जाता है। अब जरूरी यह है कि खुद देशभक्त मुसलमान आगे बढ़ कर देश की जांच एजेंसियों को पीएफआई के छिपे गुर्गों के राज फाश करें जिससे एक भी निर्दोष के साथ भूले से भी अन्याय न होने पाये। बेशक लोकतन्त्र में हमारे राजनैतिक मतभेद हो सकते हैं मगर देश के प्रति निष्ठा के मुद्दे पर किसी मतभेद की गुंजाइश नहीं है। इसी भारत में जासूसी करने के जुर्म में हिन्दू भी पकड़े जाते हैं और मुसलमान भी मगर उनके जुर्म में मजहब तो बीच में आड़े नहीं आता। देश में छिपे हुए गद्दारों को पकड़ना सबसे बड़ा धर्म होता है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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