लालू और नीतीश की शाहकारी


बिहार की राजनीति केवल 140 मिनट में जिस तरह बुधवार की रात्रि को बदली उससे यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि इसकी तहरीर कई दिनों पहले लिख दी गई थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरह लालू जी की पार्टी राजद का साथ छोड़कर भाजपा का हाथ पकड़ा वह अनायास नहीं था, इसकी तैयारी पहले से ही कर ली गई थी और नीतीश बाबू इसकी तरफ इशारा भी कर रहे थे मगर कांग्रेस व लालू प्रसाद इसे अनदेखा कर रहे थे। लालू जी के पुत्र और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर नीतीश बाबू की पार्टी जद (यू) की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी की जा रही थी उससे जाहिर हो रहा था कि महागठबंधन की गांठें खुलने के कगार पर हैं मगर सत्ता का मोह इसे बांधे हुए है। नीतीश बाबू का भ्रष्टाचार के खिलाफ का रिकार्ड यह बता रहा था कि उन्होंने सत्ता में आने के लिए भ्रष्टाचार को नजरंदाज किया था क्योंकि लालू जी के साथ जब 2015 में उन्होंने गठबंधन किया था तो वह चारा घोटाले में रांची की अदालत द्वारा दोषी घोषित हो चुके थे और जमानत पर बाहर थे मगर इसके बावजूद चुनावों में दोनों नेताओं ने एक ही मंच से चुनाव प्रचार किया था।

हकीकत यह भी है कि इन चुनावों में लालू जी की पार्टी को बिहार की जनता ने अपना समर्थन दिया और 243 सदस्यीय विधानसभा में उनकी पार्टी के सर्वाधिक 80 विधायक जीत कर विधानसभा में पहुंचे और नीतीश बाबू की पार्टी के केवल 71, इन चुनावों में आम जनता ने भाजपा को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया और उसके 53 विधायक चुने गए मगर तेजस्वी यादव के मुद्दे पर नीतीश बाबू भ्रष्टाचार से समझौता नहीं कर सके हालांकि उन्होंने कभी भी तेजस्वी यादव से इस्तीफा देने को लेकर नहीं कहा और इसकी जिम्मेदारी लालू जी पर ही छोड़ दी कि वह मामले की नजाकत को देखते हुए अपने पुत्र के ऊपर लगे आरोपों का कानूनी जवाब जनता के समक्ष रखें जिसे लालू जी ने स्वीकार नहीं किया। तब उच्च ‘नैतिक’ मानदंड स्थापित करते हुए उन्होंने स्वयं ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और ढाई घंटे के भीतर ही भाजपा से हाथ मिला कर पुन: नई सराकर बनाने का दावा ठोक दिया। इस पूरे मामले में सबसे बड़ी फजीहत ‘नैतिकता’ की हुई है।

भाजपा कह रही है कि नीतीश ने लालू का साथ छोड़कर भ्रष्टाचार से समझौता न करने की नजीर पेश की है और लालू जी कह रहे हैं कि भाजपा के साथ सरकार बनाकर नीतीश बाबू ने नैतिकता का गला घोंट दिया है और अवसरवादी की तरह उसी भाजपा से हाथ मिलाया है जिसके विरुद्ध लोगों के बीच जाकर उन्होंने वोट मांगा था। निष्कर्ष यह निकलता है कि दोनों ही तरफ से नीतीश बाबू गहरे पानी में हैं। इससे उनकी राजनीतिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि भ्रष्टाचार से हाथ मिलाकर ही वह कुर्सी पर बैठे थे मगर पूरे मामले में भाजपा का कोई दोष नहीं है क्योंकि नीतीश बाबू को महागठबंधन तोडऩे के लिए उसने मजबूर नहीं किया है, वह खुद अपनी मर्जी से चल कर भाजपा के पास आए हैं लेकिन जो लोग बिहार की राजनीति को 1967 के बाद से जानते हैं उन्हें मालूम है कि इस राज्य की जनता के राजनीतिक तेवर कैसे रहे हैं। बिहार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस राज्य में राजनीतिक विचारधाराओं का युद्ध सड़कों पर होता है। भाजपा और जद (यू) गठबंधन को इसी राज्य की जनता ने लगातार दो बार जिताया था। इससे पहले लालू जी की पार्टी को लगातार तीन बार यह जिताती रही या सबसे बड़ी पार्टी बनाती रही। सत्ता की सुविधा के लिए बने चुनाव बाद गठजोड़ इस राज्य में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए। 2000 में स्वयं नीतीश बाबू इसका नजारा देख चुके हैं जब वह कुछ दिनों के लिए ही मुख्यमंत्री बन पाए थे। ऐसा नहीं है कि लालू जी के कथित कुशासन के खिलाफ यहां की जनता ने वोट नहीं दिया। ऐसा भी हुआ मगर पर्दे के पीछे से नहीं बल्कि जनता के दरबार में हुआ।

मुझे न कुछ लालू जी से लेना है न नीतीश बाबू से बल्कि राजनीतिक मंजर का बेबाक विश्लेषण करना है और वह यह है कि नीतीश बाबू ने स्वयं को विपक्ष की राष्ट्रीय राजनीति से हटा कर लालू जी का मार्ग इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रशस्त कर दिया है। उनके हाथ में प्रताडि़त (विक्टिम) होने का अस्त्र आ गया है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि लालू प्रसाद भारत के गिने-चुने मजबूत जनाधार वाले नेताओं में से एक हैं। बेशक वह फिलहाल मुकद्दमों में घिरे हुए हैं और उनका पूरा परिवार भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में है मगर आम जनता में उनकी छवि गरीबों, पिछड़ों तथा अल्पसंख्यकों के नेता की है। उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाताओं में वह आकर्षण का केन्द्र माने जाते हैं। बिहार की राजनीति में जो कुछ भी घट रहा है उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर किस तरह पड़ेगा, अभी यह नहीं कहा जा सकता मगर विपक्ष में खाली जगह को भरने का रास्ता नीतीश बाबू ने तैयार कर दिया है। मेरे विचार से न भाजपा को चौंकने की जरूरत है और न कांग्रेस को बल्कि यह सोचने की जरूरत है कि राजनीति को ‘विज्ञान’ क्यों कहा जाता है जिसका नियम है कि कभी कोई जगह ‘खाली’ नहीं रहती।