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भारत की शरण में श्रीलंका

पड़ोसी देश श्रीलंका में आजकल जो आर्थिक बदहाली का माहौल चल रहा है उसके सन्दर्भ में सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि 1919 तक यह देश ब्रिटिश भारत का ही हिस्सा था और इसका राज भी अंग्रेज हुकूमत ही चलाती थी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद इसे पृथक देश बनाया गया और इसके बाद भारत भारत के साथ इसके सम्बन्ध जुड़वा भाई जैसे ही रहे। आजादी मिलने के बाद भारत ने इसके विकास में पूर्ण योगदान दिया और अपने मजबूत सांस्कृतिक सम्बन्धों के साथ ही इस देश में लोकतन्त्र के फलने-फूलने में मदद भी की। मगर पिछले एक दशक के दौरान जिस तरह यह देश चीन की गोदी में जा बैठा और इसमें परिवारवादी राजनैतिक संस्कृति फली-फूली उससे इसका आर्थिक पतन की शुरूआत हुई और आज हालत यह हो गई है कि इसने स्वयं को दिवालिया घोषित कर दिया है अर्थात इसकी स्थिति विदेशी कर्जों का भुगतान करने लायक नहीं बची है।

 भारतीय उपमहाद्वीप में श्रीलंका और मालदीव ऐसे  दो देश हैं जो भारत की जल सीमाओं की सुरक्षा के कवच रूप में देखे जाते हैं अतः बुरे दिनों में इनकी मदद करना भारत अपना कर्त्तव्य समझता है और उसी के अनुरूप केन्द्र की मोदी सरकार यथायोग्य कदम भी उठा रही है। इस देश में जब आतंकवादी संगठन लिट्टे पृथकतावादी आन्दोलन चला रहा था तब भी भारत ने अपनी शान्ति फौजें भेज कर इसकी मदद की थी जिससे भारतीय उपमहाद्वीप में अमन का माहौल बना रह सके। परन्तु इस बार यह आर्थिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुका है और हालत यह है कि आम जनता सड़कों पर दैनिक जरूरत की चीजों के लिए आन्दोलन कर रही है और इस देश के पास अपने लोगों को देने के लिए न अनाज है और न ईंधन। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत ने श्रीलंका को एक अरब 90 करोड़ डालर की ऋण जमानत व सहायता राशि पहले दी थी जिसे वह अब यह दुगनी करने पर विचार कर रहा है। 

असली सवाल यह है कि श्रीलंका इस हालत में कैसे पहुंचा?  इसके लिए  इसकी चीन पर निर्भरता जिम्मेदार है जिसने इसे अपने ऋणों के तले इस कदर दबा दिया कि इसकी ऋणों पर ब्याज अदा करने की क्षमता भी चूक गई। चीन ने इस देश के बन्दरगाह व अन्य आधारभूत ढांचा क्षेत्र के विकास के नाम पर इस देश की अर्थव्यवस्था को ही अपने पास गिरवी जैसा रख लिया जिसकी वजह से इसकी यह हालत हो गई। चीन एशियाई व अफ्रीकी देशों के विकास के नाम पर वहां भारी निवेश करता है और फिर आर्थिक रूप से उन्हें अपना गुलाम बना लेता है। जबकि भारत की नीति शुरू से ही यह रही है कि विकासशील देशों के विकास में मानवीयता का पुट प्रभावी रहे । इसका प्रमाण नेपाल व अफगानिस्तान जैसे देश रहे हैं जहां भारत ने विकास कार्यक्रमों को इस तरह अंजाम दिया कि वहां के लोगों की आर्थिक स्वतन्त्रता बनी रहे।

 भारत का नजरिया अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सबका साथ-सबका विकास का ही रहा है। इसका प्रमाण यह है कि भारत ने अपनी टैक्नोलोजी उन्नयन की परियोजना को ‘पैन अफ्रीका’ बनाया और बहुत सस्ते में ही विकासशील अफ्रीकी देशों को उपलब्ध कराया। यदि गौर से देखें तो श्रीलंका ‘दक्षेस’ ( सार्क) संगठन का महत्वपूर्ण सदस्य देश है। मगर बदकिस्मती से पाकिस्तान भी इसका सदस्य है और वह दक्षेस का कोई भी विकासपरक एजेंडा चलने ही नहीं देता। यहां तक कि जिस ‘सार्क चैम्बर आफ कामर्स’ का गठन लगभग तीन दशक पहले किया गया था उसके काम को भी पाकिस्तान ने चलने नहीं दिया वरना कोई वजह नहीं थी कि इस संगठन के सदस्य देश आपस में मिलकर आर्थिक मोर्चे पर एकजुटता दिखाते हुए आगे न बढ़ते। इस बारे में भारत की तरफ से पूर्व में कई बार सकारात्मक सुझाव दिये गये और कदम भी उठाये गये मगर हर बार पाकिस्तान ने अड़ंगा लगा दिया। श्रीलंका के सन्दर्भ में दूसरा कारण यह भी रहा कि यह चीन के झांसे में आ गया और अपनी सारी सम्पत्ति उसके पास गिरवी रख बैठा। चीन ने इसे केवल दस साल के भीतर ही दर-दर का भिखारी बना दिया।

वैसे यही हालत पाकिस्तान की भी है, बेशक यह दिवालिया नहीं बना है मगर दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका है। पाकिस्तान की भारत के प्रति रंजिश पर यदि खाक भी डालें तो श्रीलंका के प्रति भारत का दायित्व उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी शक्ति होने के नाते बनता है क्योंकि यहां  की तमिल जनता भारत को ही अपना दूसरा घर मानती है। यहां के तमिलों का भारतीयों से रोटी-बेटी का व्यवहार रहा है और आन्ध्र प्रदेश के पूर्व रजवाड़ों के भी श्रीलंकाई लोगों के साथ अन्तरंग सम्बन्ध रहे हैं। अतः भारत सरकार इसी दृष्टि से श्रीलंका की बुरे वक्त में मदद करने के तरीके खोज रही है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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