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संपादकीय

लो वो सामने खड़ी है आर्थिक मंदी

क्या दुनिया में मंदी एक बार फिर दस्तक देगी? क्या मंदी इस वर्ष के अंत तक हमारे सामने होगी? अगर नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमेन की चेतावनी को स्वीकार कर लिया जाए तो 2019 के अंत तक या फिर अगले वर्ष वैश्विक मंदी आ सकती है। दुबई में वर्ल्ड गवर्नमेंट शिखर सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस बात की सम्भावना कम है कि किसी एक बड़ी चीज से आर्थिक सुस्ती आए। कई आर्थिक उतार-चढ़ाव या समस्याओं से आर्थिक मंदी की सम्भावना काफी बढ़ गई है। अर्थशास्त्री क्रुगमेन का कहना है कि सबसे बड़ी चिन्ता तो यह है कि मंदी आ भी जाए तो उसका प्रभावी तरीके से जवाब देने के लिए हमारे पास कोई सुरक्षा तंत्र नहीं है। केन्द्रीय बैंक के पास बाजार के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए साधनों की कमी होती है।

प्रथम विश्वयुद्ध से उत्पन्न परिस्थितियां ही आर्थिक मंदी का कारण बनीं। युद्धकाल में सैनिक सामग्री की मांग बढ़ जाने से उद्योगों का विस्तार हुआ। मजदूरी की दर में वृद्धि हुई, लाभांश उससे कहीं अ​धिक हुआ। अन्ततः प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लोग उद्योगों की तरफ झुकते चले गए। कृषि का उत्पादन तो बढ़ा लेकिन खाद्यान्न की कीमत गिर गई। कृषकों की क्रय क्षमता घट गई। उद्योगपतियों को भारी मुनाफा हुआ लेकिन श्रमिकों को नहीं। 1923-29 के बीच मजदूरी 8 फीसदी बढ़ी जबकि मुनाफा 72 फीसदी बढ़ा। आंकड़ों से स्पष्ट है कि आम जनता की क्रय शक्ति इतनी नहीं थी कि वह मंदी को थाम सके। दुर्भाग्य से मालिक न तो कीमत घटाने को तैयार थे और न ही मजदूरी बढ़ाने को तैयार। अतः उपभोक्ता वस्तुओं की भरमार बनी रही लेकिन बाजार में खरीदार ही नहीं था। अमेरिका यूरोपीय माल खरीदने को तैयार नहीं था। यूरोप के पास डॉलर की कमी हो गई थी।

एशिया मेें स्वदेशी आंदोलन, रूस में वोल्शेविक क्रांति तथा युद्ध के बाद यूरोप ने नए राज्य संरक्षणवादी सिद्धांत को लेकर प्रयोग किए। विश्व बड़ी मुश्किल से मंदी के दौर से निकला। 2000 के दशक के उत्तरार्द्ध की आर्थिक मंदी एक गम्भीर मंदी थी, जो अमेरिका में दिसम्बर 2007 से शुरू होकर 2010 तक छाई रही। अमेरिका में वित्तीय संकट का सम्बन्ध सरकार के प्रोत्साहन से वित्तीय संस्थानों द्वारा लापरवाही से कर्ज दिए जाने के चलते और रियल एस्टेट सम्बन्धी बंधकों के प्रतिभूतिकरण की बढ़ती प्रवृत्ति से था। एक ओर अधिक बड़े पैमाने पर क्रेडिट बूम ने रियल एस्टेट और शेयरों के वैश्विक सट्टेबाजी के बुलबुले को फलने-फूलने का मौका दिया जिससे जोखिमपूर्ण कर्ज देने को बढ़ावा मिला।

ऋण के घाटे के बढ़ने और 15 सितम्बर 2008 को लीमेन ब्रदर्स के पतन के साथ ही अंतर बैंक ऋण बाजार में बड़ी घबराहट फैल गई। शेयर और हाउसिंग की कीमतों में गिरावट के साथ अमेरिका और यूरोप के कई बड़े बैंकों को भारी नुक्सान का सामना करना पड़ा आैर यहां तक कि वे दिवालियेपन की कगार पर पहुंच गए। वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में तेजी से गिरावट आई और बेरोजगारी में काफी बढ़ौतरी हुई। भारत में इस मंदी का कुछ असर तो हुआ लेकिन आम जनता इससे बचकर निकल गई। भारत में आम जनता के लिए बचत एक परम्परा के अनुसार है।

भारतीय बचत इसलिए करते हैं कि भविष्य में सुख-दुःख में उन्हें किसी के आगे हाथ न पसारने पड़ें और वह बचत की राशि से काम चला लें। बचत ने ही भारतीयों को बचाया क्योंकि उनकी बचत का पैसा बैंकों में पड़ा था। इससे पहले जनवरी माह में विश्व बैंक ने दुनिया को आर्थिक मंदी को लेकर आगाह किया था। विश्व बैंक के सीईओ क्रिस्टलीना जार्जिवेबा ने कहा था कि भारत जैसे विकासशील देशों को बाजार में नई चुनौतियों का सामना करने को तैयार रहना चाहिए। अमेरिका और चीन में व्यापार युद्ध, अमेरिका-ईरान टकराव, ब्रिटेन में ब्रेग्जिट को लेकर अनिश्चितता जैसी वजहों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विनिर्माण गतिविधियों में कठिनाइयां बढ़ रही हैं। भारत भले ही विश्व आर्थिक परिदृश्य पर सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा लेकिन उसे राजकोषीय और मौद्रिक क्षेत्र में नीतियों पर नियंत्रण रखना होगा। विकासशील देशों की सरकारों को अपने ऋण प्रबन्धन पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

फैडरल रिजर्व के पूर्व चेयरमैन एलन ग्रीन पीस ने भी चेतावनी दी है कि अमेरिका में बढ़ते सार्वजनिक कर्ज के कारण अगली आर्थिक मंदी आ सकती है। अमेरिका में सार्वजनिक कर्ज रिकार्ड 22 हजार अरब डॉलर की ऊंचाई पर पहुंच गया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा 1500 अरब डॉलर की कर छूट और सरकारी खर्च में बढ़ौतरी ने बजटीय घाटे और सार्वजनिक कर्ज दोनों में तेजी से बढ़ौतरी की है। जहां तक चीन का सवाल है वर्ष 2018 में उसकी आर्थिक विकास की दर 28 वर्षों में सबसे धीमी रही है। चीन की अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार से दुनिया में आर्थिक बाजार में गिरावट आ सकती है। चीन के आर्थिक हालात से भारत समेत पूरी दुनिया प्रभावित हो सकती है। मंदी से चीन को निर्यात करने वाले देशों पर असर होगा। चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वार की वजह से स्थितियां गम्भीर नजर आ रही हैं। देखना होगा मंदी की स्थिति में दुनिया इससे कैसे निपटती है?