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ननकाना साहिब में ‘पथराव’

पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर जिस तरह शुक्रवार को सिख विरोधी प्रदर्शन हुआ वह बताता है कि पाकिस्तान की कथित अर्ध लोकतान्त्रिक इमरान सरकार कितनी लाचार और मजबूर है जो अपने ही प्रयोजन को महफूज रखने में नाकाबिल है। अभी 12 नवम्बर को बीते बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है जब गुरु नानक देव जी महाराज के 550वें जयन्ती वर्ष (गुरु पर्व) पर भारत-पाक सीमा पर पाकिस्तान की सरहदों में स्थित करतारपुर साहिब गुरुद्वारे के लिए उपमार्ग (कारिडोर) का उद्घाटन हुआ था और इसके जरिये ननकाना साहिब गुरुद्वारे के दर्शन भी सुगम हुए थे मगर देखिये क्या बेगैरती है कि पाकिस्तान के कुछ सिरफिरे तास्सुबी लोगों की कि उन्होंने उस स्थान पर पत्थरबाजी करने की हिमाकत की जिसे ननकाना साहिब नाम ही एक मुसलमान ने गुरु साहिब के सम्मान में दिया। 

इस स्थान को एक मुस्लिम ‘राय भोई’ ने बसाया था जिससे इसका नाम पहले ‘राय भोई दि तलवंडी’  था  मगर इस कस्बे में गुरु नानक देव जी के जन्म के बाद राय भोई के प्रपौत्र ‘राय बुलर भट्टी’  ने इसे ‘ननकाना साहिब’ नाम दिया। ननकाना साहिब गुरु नानक देव जी का जन्म स्थल और करतारपुर साहिब उनका निर्वाण स्थल है और इन दोनों की दूरी बहुत ज्यादा नहीं है। पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान ने करतारपुर साहिब कारिडोर खोलते हुए जो प्रेम मुहब्बत की घोषणाएं की थीं वे विगत 3 जनवरी को तब सभी काफूर हो गईं जब ननकाना साहिब पर हमले की कोशिश की गई। पाकिस्तान की सभी पिछली लोकतान्त्रिक सरकारें भी ननकाना साहिब का बुलन्द एहतराम करती रही हैं। 

ननकाना साहब कस्बे को 2005 में पूरे जिले का रुतबा देकर ननकाना साहिब विश्वविद्यालय भी कालान्तर में स्थापित किया गया मगर नादान हैं वे लोग जो गुरु नानकदेव जी की कैफियत से नावाकिफ हैं क्योंकि ‘गुरु ग्रन्थ साहब’ में लगभग 19 बार कुरान शरीफ की आयतों का जिक्र आया है और खुदा की शान का बखान किया गया है। जिस आन्दोलनकारी ने ननकाना साहिब की शान में गुस्ताखी करते हुए इसका नाम बदलने की धमकी दी है उसने पूरी मुस्लिम कौम की न केवल तौहीन की है बल्कि इसे पूरी तरह शर्मसार कर दिया है क्योंकि गुरु नानक देव जी के सम्मान में बगदाद तक में उनका वह स्थान पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है जहां अपनी मक्का-मदीना की यात्रा के दौरान उन्होंने सद-वचन सुनाये थे। 

गुरु जी की तस्वीर भी इसी कमरे में स्थापित है, परन्तु पाकिस्तान में जिस तरह हिन्दू विरोध को भारत विरोध का पर्याय बना दिया गया है उससे इस मुल्क की मुरदारी का अन्दाजा लगाया जा सकता है मगर हमें गौर से यह विचार करना चाहिए कि भारत में संशोधित नागरिकता कानून को लेकर जो विरोध और समर्थन हो रहा है उसमें ननकाना साहिब हमले की क्या भूमिका है और पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान ने बंगलादेश की एक वीडियो को भारत के उत्तर प्रदेश की बता कर जिस तरह प्रचारित किया है उससे क्या सिद्ध होता है। इमरान खान अपने मुल्क में  जब अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ हैं तो वह भारत के बारे में ऐसा ही दुष्प्रचार क्यों कर रहे हैं? 

उनका मकसद केवल यही हो सकता है कि वह भारत की सामाजिक स्थिति भी अपने नामुराद और नाजायज मुल्क पाकिस्तान की मानिन्द देखना चाहते हैं मगर यह ताकयामत तक मुमकिन नहीं है क्योंकि हिन्दोस्तानी मुसलमान अपनी उस मिट्टी से प्यार करते हैं जिसमें उनका जन्म हुआ है और वे इसी में फना भी हो जाना चाहते हैं क्योंकि इसी की बदौलत उनका वजूद है। यही वजह है कि वे संशोधित नागरिकता कानून का विरोध कर रहे हैं। पाकिस्तान इस स्थिति का लाभ उठाना चाहता है और वह दुतरफा चाल चल कर भारतीयों मुसलमानों को अपनी इस्लामी पहचान के धोखे में उलझाना चाहता है मगर इमरान खान को शायद मालूम नहीं है कि यह उस ‘ब्रिगेडियर उस्मान’ का भारत है जिसने पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की पाक फौज के जनरल बनने की पेशकश को ठोकर पर रख यह कहते हुए उड़ा दिया था कि वह सबसे पहले हिन्दोस्तानी हैं। 

अतः मेरठ के मवाना कस्बे के एक मुहल्ले ‘तिहाई’ में जिस तरह कुछ युवकों ने पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाने की भूल की वह केवल उन तत्वों को ही मजबूत करेगी जो भारत को पाकिस्तान जैसा देखना चाहते हैं। भारत में मन्दिर और शिवालयों की घंटियों के साथ ही ‘अजां’ भी गूंजती है और हिन्दू, गरीब दस्तकार व फनकार व छोटे दुकानदार ईद के दिन अपनी ‘दिवाली’ मनाते हैं तो दिवाली के दिन मुस्लिम दस्तकार और फनकार अपनी ‘ईद’ मनाते हैं। इसकी वजह इन पर्वों पर हिन्दू और मुसलमान गरीब तबकों की आर्थिक इफरात से है। यह बेजोड़ संस्कृति भारत का ही नायाब तोहफा है जो इंसानियत को मिला हुआ है। 

ननकाना साहिब पर पत्थरबाजी करके पाकिस्तान यही सिद्ध करना चाहता है कि उसके यहां अल्पसंख्यकों पर जौर-जुल्म ढहाये जाते हैं। ऐसा करके वह अपनी ही फजीहत कर रहा है क्योंकि भारत के लोग उस संविधान से बन्धे हुए हैं जो मजहब को नागरिकों का निजी मामला मानता है और हुक्म देता है कि भारत में रहने वाला हर आदमी सबसे पहले हिन्दोस्तानी है। हिन्दू-मुसलमान देख कर यहां हकों का बंटवारा नहीं होता बल्कि नागरिक मान कर सभी को एक समान हक दिये जाते हैं, इसलिए ननकाना साहब की वीडियो को देख कर भारत के लोग सिर्फ पाकिस्तान की भर्त्सना करेंगे और कहेंगे कि जो मुल्क मुसलमानों की ही अकीदत की इज्जत नहीं कर सकता वह भला किस तौर पर मुस्तफा की हिदायतों का पेशकार हो सकता है। ननकाना साहिब तो ‘राय बुलर’ की ही कयादत में तामीर हुआ था।