पंडित जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में तत्कालीन रक्षा मंत्री वेंगालिल कृष्णन कृष्णा मेनन ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ऐतिहासिक भाषण दिया था। 23-24 जनवरी, 1957 को कृष्णा मेनन ने पहली बार कश्मीर का संयुक्त राष्ट्र के किसी अंतर्राष्ट्रीय मंच से जिक्र किया था। उनका सम्बोधन सात घंटे, 48 मिनट का था। उनका भाषण पाकिस्तान के भाषण के बाद हुआ था जिसमें पाकिस्तान ने कहा था कि भारत का कश्मीर पर हक गैर-कानूनी है। आज भी लोग स्वीकार करते हैं कि मेनन के भाषण ने कश्मीर पर भारत की स्थिति का समर्थन करने और इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की राय को ठोस आकार देने में एक अहम भूमिका अदा की थी। मेनन अपनी मैराथन स्पीच के दौरान थकान की वजह से गिर गए थे और उन्हें उस समय तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन जब वह अस्पताल से लौटे तो फिर उन्होंने एक घंटे में अपना भाषण पूरा किया था। इस दौरान एक डाक्टर लगातार उनकी स्थिति पर नजर रखे हुए थे। इतिहासकार मानते हैं कि मेनन के भाषण के बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पर वीटो का फैसला किया था। कहा जाता है कि अगर यह भाषण नहीं होता तो शायद कश्मीर पाक को दे दिया जाता। मेनन ने तब कहा था ”ऐसा क्या है कि हमने अभी तक दमन कर रखे गए लोगों की आजादी और पाकिस्तान के अत्याचार से जुड़ी आवाज को नहीं सुना है? ऐसा क्यों है कि हमने कभी नहीं सुना कि इन दस वर्षों में इन लोगों ने कभी बैलेट पेपर देखा है? ऐसे में किसी आवाज के साथ सुरक्षा परिषद या फिर कोई और उन लोगों के लिए जनमत संग्रह की मांग कर रहा है जो हमारी तरफ हैं और जिनके पास बोलने की आजादी है और कई सैकड़ों स्थानीय निकाय के तहत कार्य कर रहे हैं।” मेनन ने अपने तर्कों से पाक के हर तर्क को काट दिया।

संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री रहे स्वर्ण सिंह, स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी सम्बोधन किया था, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण सबसे यादगारी रहा। अटल जी पहले भारतीय थे, जिन्होंने 4 अक्तूबर, 1977 को संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था। 1977 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी जब विदेश मंत्री थे तो एक यादगार लम्हा था, जो इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। सितम्बर 2000 में अटल जी प्रधानमंत्री के रूप में अमेरिका दौरे पर गए तो एक बार फिर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ को हिन्दी में सम्बोधित किया और आज भी कहीं हिन्दी की बात होती है तो अटल जी हमेशा याद किए जाते हैं। अटल जी के सम्बोधन के इतने आयाम थे जो प्रथम दृष्टया महसूस नहीं हुए परंतु हमें उनकी विवेचना की तो बहुत कुछ सामने आया। अटल जी कुशल वक्ता तो हैं ही, उन्होंने पूरी दुनिया को इस बात से अवगत कराया कि भारत एक शांतिप्रिय देश है, फिर भी उसे बार-बार युद्घ झेलने पड़े। विश्व युद्धों की ओर न जाए, भारत को ही देखे। भारत को पाकिस्तान से 1965, 1971 में बड़े युद्ध लडऩे पड़े। दो युद्ध 1947 और 1999 में भी लडऩे पड़े। पाकिस्तान से अघोषित युद्ध जारी है। 1962 में भारत को चीन से युद्ध लडऩा पड़ा। अटल जी ने अपने शब्दों में पूरी दुनिया को इस बात से अवगत कराया कि स्वत्व की रक्षा के लिए युद्ध लड़े जाते तो इस बात में कोई गलती नहीं, परंतु भारत को युद्ध इसलिए भी झेलने पड़े क्योंकि दो मुल्कों की महत्वाकांक्षाएं बहुत बढ़ गई थीं। पाकिस्तान की वक्रदृष्टि कश्मीर पर थी और चीन ने भी हमारा बड़ा भू-भाग कब्जे में ले रखा था। समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है।

अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से कहा था कि संघ का परम उद्देश्य ही आने वाली नस्लों को युद्ध से बचाना है जिन्हें हम पहले झेल चुके हैं। वास्तव में अटल जी का भाषण भारत के परिप्रेक्ष्य में तो था ही, साथ ही विश्व के परिपे्रक्ष्य में भी था। उन्होंने अफगानिस्तान, इराक का मुद्दा भी उठाया। 2003 में अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र आमसभा में तत्कालीन पाकिस्तान के जरनल मुशर्रफ के भाषण के बाद अपने सम्बोधन में पाकिस्तान की बोलती बंद कर दी थी। अब शनिवार को समूचे राष्ट्र ने विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज का संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में सम्बोधन सुना तो अटल जी बहुत याद आए। यद्यपि श्रीमती स्वराज का यह संयुक्त राष्ट्र में दूसरा सम्बोधन था लेकिन उनके तर्कों और तेवर ने पाकिस्तान को तो धोया ही साथ ही वैश्विक नेताओं को पाकिस्तान की आतंकवाद पर घिनौनी भूमिका के संबंध में सोचने पर विवश कर दिया। पाकिस्तान को उन्होंने औकात तो दिखाई ही साथ ही संयुक्त राष्ट्र की कार्यशैली को लेकर भी सवाल खड़े किए तथा चीन पर भी निशाना साधा। जहां उन्होंने दुनिया को भारत और पाकिस्तान में अंतर को समझाया और पाक को आतंकवादी राष्ट्र की श्रेणी में ला खड़ा किया वहीं जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने में अड़ंगेबाजी के कारण चीन को लपेटा। श्रीमती सुषमा स्वराज ने स्पष्ट कहा कि अगर हम अपने शत्रु को परिभाषित नहीं कर सकते तो फिर मिलकर कैसे लड़ सकते हैं। तेरा आतंकवाद और मेरा आतंकवाद नहीं चल सकता। अभी तक संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद की परिभाषा तय नहीं कर पाया तो एक साथ मिलकर क्या खाक लड़ेंगे? उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पदभार संभालने के बाद शांति और दोस्ती का हाथ बढ़ाया लेकिन पाक प्रधानमंत्री को इस बात का जवाब देना चाहिए कि आपके देश ने इस प्रस्ताव को क्यों ठुकराया?

उन्होंने जलवायु, समुद्री सुरक्षा, परमाणु हथियार पर भी बात की लेकिन उनका ज्यादा जोर आतंकवाद पर रहा। उन्होंने आह्वान किया कि समूचे विश्व को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि के लिए नई प्रतिबद्घता दिखानी चाहिए। बुराई की निंदा केवल एक दस्तूर बन गया है, हमें शत्रु का नाश करने के लिए दोहरापन छोडऩा होगा। श्रीमती सुषमा स्वराज के हिन्दी में दिए गए भाषण की सराहना विपक्ष ने भी की है। उनका भाषण परिपक्वतापूर्ण और समझबूझ से भरा था। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष मजबूती से रखा। पूरे राष्ट्र ने यह स्वीकारा कि सुषमा स्वराज का कोई जवाब नहीं।