मन्दिर, मंडल और मार्केट !


यह स्वयं विरोधाभासी है कि 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में जिस बाबरी ढांचे को तोड़ा गया था, उसमें हुई कानून की अवहेलना के बारे में फैसला आने से पहले ही सियासत शुरू हो गई है। जिस तरह भारत के समूचे संविधान की धज्जियां 6 दिसम्बर 1992 को उड़ाई गई थीं उसे हम समग्र भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से अलग रखकर नहीं देख सकते क्योंकि यह वह दौर था जब भारत में मन्दिर, मंडल और मार्केट तीनों को गड्डमड्ड करके भारत की विकास गाथा को उलटने की कोशिश की जा रही थी और इसके लोगों को धर्म व जाति के नाम पर लड़ाकर इस देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के रहमो-करम पर छोड़ने की तजवीजें भिड़ाई जा रही थीं। यह ताजा इतिहास में दर्ज पुख्ता हकीकत है कि मन्दिर आन्दोलन से पैदा हुए मजहबी जुनून ने भारतीय अर्थव्यवस्था की उस बुनियाद को हिलाकर रख दिया जिसके बूते इसने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं का बाजार बनाकर पेश किया था।

केवल 33 करोड़ की आबादी से शुरू हुए स्वतन्त्र भारत की 98 प्रतिशत जनता के खेती पर निर्भर होने के परिदृश्य को पुरानी अर्थव्यवस्था ने 1991 के आते-आते 100 करोड़ की आबादी वाले देश के लोगों की खेती पर निर्भरता कुल 67 प्रतिशत कर दी थी। यह दुनिया के किसी भी प्रजातन्त्र में की गई महानतम उपलब्धि थी क्योंकि यह लक्ष्य हमने भारत के लोगों की निजी स्वतन्त्रता और व्यक्तिगत गौरव की रक्षा करते हुए और इसे सम्पूर्ण संरक्षण देते हुए उनके सांस्कृतिक विविधता के माहौल में प्राप्त किया था। हमने यह तरक्की चीन के कम्युनिस्ट शासन की तरह आदमी को मशीन बनाकर नहीं की थी बल्कि उसके आत्मगौरव को सर्वोपरि रखकर प्राप्त की थी। नेहरू और इंदिरा गांधी की राजनीतिक सोच के परिणामों से ही भारत मेंं गरीबी की सीमा रेखा में लगातार गिरावट दर्ज हुई थी और भारत लगातार हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करते हुए पश्चिमी देशों व अमरीका को मुंह चिढ़ा रहा था मगर स्वतन्त्र भारत के इतिहास में अगर कोई सबसे कमजोर प्रधानमन्त्री कहा जा सकता है तो वह निश्चित रूप से पीवी नरसिम्हा राव ही थे जिन्होंने एक ही झटके में भारत की समावेशी संस्कृति का ध्वंस करने के साथ ही इसकी अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के समक्ष गिरवी रखने में हिचक नहीं दिखाई। यह नरसिम्हा राव ही थे जिनके प्रधानमन्त्रित्व में अयोध्या में पूरे सरकारी बन्दोबस्त के बीच बाबरी ढांचा ध्वस्त किया गया और दुनिया को पैगाम दिया गया कि भारत एकल धार्मिक राष्ट्रवाद की राह पर चलने के मुहाने पर आकर बैठ गया है। इससे आर्थिक मोर्चे पर भारत की उस ताकत को तोड़ डाला गया जिसके बूते यह खाद्यान्न उत्पादन में भारी मशक्कत के बाद आत्मनिर्भर बना था। यह पक्की हकीकत है कि नरसिम्हा राव ने अपने पूरे पांच वर्ष के शासनकाल में कृषि क्षेत्र को लावारिस बनाकर छोड़ दिया और धार्मिक उन्माद व मंडल ने इसी समाज को जातिगत वर्गों समेत टुकड़ाें में बांट दिया।

खेती में सरकारी निवेश को हाशिये पर डाल दिया गया। इसके असर से भारत की राजनीति लगातार संकीर्ण दायरे में सिमटती चली गई और इसने आर्थिक मोर्चे को लावारिस बना डाला। अतः यह समझा जाना जरूरी है कि क्यों भारत में जातिगत आधार पर बने दलों को समर्थन की प्रक्रिया शुरू हुई और क्यों भारत में कट्टरपंथी ताकतों का उदय हुआ मगर इसका अर्थ यह कदापि न निकाला जाये कि अयोध्या में श्रीराम मन्दिर का निर्माण नहीं होना चाहिए मगर इसका निर्माण भारत के कानून की मर्यादा को लांघकर करना पूरे देश को अराजकता की भेंट चढ़ाने जैसा होगा क्योंकि जो लोग राम को राजनीतिक मुद्दा बनाना चाहते हैं उनका उद्देश्य भारत को मजबूत करना कैसे हो सकता है जबकि वे इसके परिणाम में अपना वोट बैंक देख रहे हैं। राम मंदिर भारतीयों की आस्था है। मंदिर बने लेकिन सौहार्द से, प्रेम से बने। हमें एसे उदाहरण ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत भी नहीं है। पड़ोसी पाकिस्तान में पिछले 70 सालों से यही हो रहा है मगर इसका परिणाम वहां मजहबी आतंकवाद निकला है और उसकी ऐसी फौज निकली है जो स्वयं ही आतंकवादियों को प्रशिक्षित करती है। एेसी ही ताकतें भारत में भी अराजकता पैदा करने की फिराक में रहती हैं और इस देश की समावेशी संस्कृति को विध्वंस की आग में झोंक देना चाहती हैं। भारत के लोग विध्वंस की राजनीति को शुरू से ही ठोकर पर मारते रहे हैं। हो सकता है कि कुछ समय के लिए वे गफलत में आ जायें मगर इतिहास गवाह है कि उनमें इतनी दूरदर्शिता है कि वे भारत को ‘भारत’ बनाये रख सकें।

1967 में एेसा ही नजारा तब पैदा हुआ था जब गाैहत्या पर प्रतिबन्ध के नाम पर धार्मिक उन्माद पैदा हुआ था मगर 1971 में जब इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का लोगों से जुड़ा मुद्दा दिया तो एेसे-एेसे लोग चुनाव हार गये थे जो खुद को गरीबों का भाग्यविधाता कहा करते थे। इनमें टाटा, बिड़ला से लेकर बडे़-बडे़ राजा-महाराजा और राजनीतिक मठाधीश तक शामिल थे। यह स्पष्ट होना चाहिए कि राम हिन्दुओं की जिद हैं मगर उनका नाम लेकर केवल सृजन ही किया जा सकता है, विध्वंस नहीं। क्योंकि निराकार ब्रह्म की उपासना करने वाले सन्त कबीर ने राम का निराकार रूप ही देखा और गुरुनानक देव जी महाराज ने भी। दोनों का ही लक्ष्य हिन्दू धर्म से पाखंड को समाप्त करना था क्योंकि इसी रास्ते से कोई भी सम्प्रदाय विकास की सीढ़ी चढ़ सकता है। कबीर दास ने तो साढे़ पांच सौ साल पहले ही साफ कहा था कि :
हिन्दू कहे मोहे राम पियारा, तुरक कहे रहिमानी,
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए कोऊ मरम न जानि।