विश्वविद्यालयों में नियुक्ति को लेकर रोस्टर विवाद अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। संसद में भी इस पर जोरदार हंगामा हुआ और समूचा विपक्ष एकजुट दिखाई दिया। राजनीतिक दलों के साथ-साथ ओबीसी संगठन आम चुनाव से ठीक पहले विरोध में उतर आए हैं। कई जगह प्रदर्शन भी हुए हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों में बड़े प्रदर्शन की तैयारियां की जा रही हैं। सोशल मीडिया पर और अन्य दूसरे प्लेटफार्मों पर 13 प्वाइंट रोस्टर शब्द देखने को मिल रहा है। दरअसल 13 सूत्री रोस्टर सिस्टम विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करने का नया तरीका है। 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन मंत्रालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पिछले माह 22 जनवरी को खारिज कर दिया था। इसी के साथ तय हो गया है कि विश्वविद्यालयों में खाली पदों को 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के जरिये ही भरा जाएगा। अब सरकार से मांग की जा रही है कि अदालत के फैसले को खारिज करने के लिए विधेयक लाया जाए और पुरानी रोस्टर प्रणाली को फिर से लागू किया जाए।

13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम को एससी, एसटी, ओबीसी आरक्षण सिस्टम के साथ खिलवाड़ बताया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भर्ती विभाग/विषय के हिसाब से होगी न कि विश्वविद्यालय के हिसाब से। इस पर बवाल मचा हुआ है। रोस्टर एक विधि है जिसके जरिये नौकरियों में आरक्षण लागू किया जाता है। अगर इसे लागू न किया जाए या लागू करने में बेईमानी हो तो आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ जाती हैं। विश्वविद्यालय तो लम्बे समय तक अपनी स्वायत्तता का हवाला देकर आरक्षण लागू करने से मना करते रहे, लेकिन जब सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी दबाव बढ़ने लगा तो उन्होंने आरक्षण लागू करने की हामी तो भर दी लेकिन उन्होंने ऐसी चालबाजी की, जिससे यह प्रभावी ढंग से लागू ही न होने पाए।

2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के दौरान विश्वविद्यालय में नियुक्तियों का मामला केन्द्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के सामने आया, क्योंकि इस बार आरक्षण उस सरकार के समय लागू हो रहा था, जिसमें राजद, डीएमके, पीएमके, जेएमएम जैसी पार्टियां शामिल थीं, जो कि सामाजिक न्याय की पक्षधर रहीं, इसलिए विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करने में आ रही विसंगतियों को दूर करने के लिए यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफैसर वी.एन. राजशेखरन पिल्लई ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफैसर राव साहब काले की अध्यक्षता में आरक्षण लागू करने के लिए फार्मूला बनाने के लिए एक तीन ​सदस्यीय कमेटी का गठन किया था, जिसमें कानूनविद् प्रोफैसर जोश वर्गीज और यूजीसी के तत्कालीन सचिव आर.के. चौहान सदस्य थे। प्रोफैसर काले कमेटी ने 200 प्वाइंट का रोस्टर बनाया। इस रोस्टर में किसी विश्वविद्यालय के सभी विभागों में कार्यरत असिस्टैंट प्रोफैसर, एसोसिएट प्रोफैसर और प्रोफैसर का तीन स्तर का कैडर बनाने की सिफारिश की गई। इसमें कमेटी ने विभाग की बजाय विश्वविद्यालय और कॉलेज को एक यूनिट मानकर आरक्षण लागू करने की सिफारिश की।

काले कमेटी ने रोस्टर को 100 प्वाइंट पर न बनाकर 200 प्वाइंट पर बनाया क्योंकि अनुसूचित जातियों को 7.5 प्रतिशत आरक्षण है। अगर यह रोस्टर 100 प्वाइंट पर बनता तो अनुसूचित जातियों को किसी विश्वविद्यालय में विज्ञापित 100 पदों में 7.5 देने होते जो कि सम्भव ही नहीं था। ज्यादातर विश्वविद्यालयों ने अपने यहां आरक्षण सिर्फ कागजों पर ही लागू किया था, इसलिए इस रोस्टर के आने के बाद वे फंस गए क्योंकि वे नया पद अनारक्षित वर्ग के लिए तब तक नहीं निकाल सकते थे, जब तक कि पुराना बैकलॉग भर न जाए। उन्होंने विभाग स्तर पर रोस्टर लागू करने की मांग उठाई। रोस्टर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और वहां से निर्णय ​आता है ​िक रोस्टर को विश्वविद्यालय स्तर पर लागू न करके विभाग स्तर पर लागू किया जाए। इसके बाद बहुत दिनों से शांत बैठे विश्वविद्यालय जल्दी-जल्दी विज्ञापन निकालते हैं, जिसमें रिजर्व पोस्ट या तो होती ही नहीं और होती हैं तो बेहद कम होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को यथावत रखता है। स्पष्ट है कि 13 प्वाइंट सिस्टम ने विश्वविद्यालयों में आरक्षण की पूरी प्रणाली को ही खत्म कर दिया। किसी भी विभाग की शुरूआत करने के लिए दो असिस्टैंट प्रोफैसर, एक एसोसिएट प्रोफैसर और एक प्रोफैसर चाहिए। मतलब कुल संख्या चार या पांच ही होगी। ऐसे में एससी, एसटी, आेबीसी को आरक्षण देने के लिए इतनी वेकेंसी कहां से आएंगी। देश में शायद ही कोई ऐसा विश्वविद्यालय हो जहां एक विभाग में एक साथ 14 या इससे ज्यादा वेकेंसी निकाली जाती हों, इसका सीधा सा अर्थ है कि ओबीसी, एससी के हक की रक्षा नहीं हो पा रही। यह सिस्टम तो एसटी समुदाय के रिजर्वेशन को तो बिल्कुल खत्म ही कर देगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के विश्वविद्यालयों में 95.2 प्रतिशत प्रोफैसर, 92.9 प्रतिशत एसोसिएट, 66.27 प्रतिशत असिस्टैंट प्रोफैसर जनरल कैटेगरी से आते हैं, इनमें एससी, एसटी और आेबीसी के वे उम्मीदवार हैं, जिन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिला है। केन्द्र सरकार को इस मामले में अध्यादेश लाकर पुरानी व्यवस्था को बहाल कर दलितों को न्याय दिलाना ही होगा।