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संपादकीय

विपक्षी एकता का सुनहरा ख्वाब

 ashwini sir

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणामों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक पुनर्गठन की शुरूआत की तरफ संभवतः विश्लेषकों का ध्यान नहीं गया है और मोटे रूप में देखा जाये तो इस घटना को अनदेखा कर गया है। विगत 4 नवम्बर को राजधानी में ही 13 सियासी पार्टियों की संयुक्त बैठक में लोकतान्त्रिक जनता दल के अध्यक्ष श्री शरद यादव ने घोषणा की कि दो राज्यों के जो चुनाव परिणाम मतदाताओं ने दिये हैं उन्होंने राजनीतिज्ञों को आगे का रास्ता दिखा दिया है। यह स्वीकारोक्ति है कि भारत के मतदाता समय पड़ने पर राजनीति को नई दिशा देने में समर्थ हैं मगर यह आगे का रास्ता क्या है? इस पर राजनैतिक दलों को ही विचार करना है। 

मतदाताओं ने अपने हिस्से की जिम्मेदारी इस प्रकार निभाई है कि उन्होंने हरियाणा और महाराष्ट्र में पिछले पांच साल से सत्ता कर रही भाजपा को चेतावनी दी है कि उसकी केन्द्र की सरकार की सफलताओं को राज्यों में पार्टी एक सीमा तक ही भुना सकती है लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे इधर-उधर बिखरे विपक्ष को सद्बुद्धि आयेगी और वह संघीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम किसी ठोस वैकल्पिक नेतृत्व को उकेरेगा? केवल 13 समान विचार वाले दलों के एक साथ आने से तब तक कुछ हासिल होने वाला नहीं है जब तक कि आम जनता में यह विश्वास  पैदा न हो कि विपक्ष में बैठे लोग उसकी उन आकांक्षाओं पर खरा उतर सकते हैं जो किसी कारणवश वर्तमान सत्तापक्ष द्वारा पूरी नहीं हुई हैं।

हकीकत तो यह है कि विपक्ष विचारों की लड़ाई में भाजपा से लगातार पराजित हो रहा है। बेशक विरोध में एक से एक धुरंधर विचारक कहे जाने वाले लोग हों और उनके साथ कथित सामाजिक आन्दोलन के कार्यकर्ता से लेकर प्रस्तोता और नेता  कहे जाने वाले लोग हों, मगर विभिन्न ज्वलन्त विषयों पर इनके द्वारा भाजपा के विचारों की जिस तरह काट की गई वह आम भारतीय के गले नहीं उतरी है। चाहे पाकिस्तान का मामला हो या कश्मीर का अथवा एनआरसी का, सभी मुद्दों पर सामान्य व्यक्ति को भाजपा की सोच और इसकी सरकार द्वारा की गई कार्रवाई अपेक्षाकृत अधिक राष्ट्रोन्मुख लगी है परन्तु इसके बावजूद महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने मोहभंग के वातावरण में जनादेश दिया है जिस पर विपक्षी दल खुशियां मनाते लगते हैं।

हालांकि देश की सबसे पुरानी और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के इस पर प्रसन्न होने का कोई कारण नहीं है क्योंकि बकौल इसी पार्टी के कद्दावर नेता माने जाने वाले राजस्थान के मुख्यमन्त्री श्री अशोक गहलोत ने यह स्वीकार किया है कि उनकी पार्टी के नेताओं ने चुनावों से पहले ही अपनी हार मान कर हथियार डाल दिये थे। श्री गहलोत के इस कथन का यदि वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाये तो इसका अर्थ यह निकलता है कि कांग्रेस पार्टी का मनोबल इस कदर गिर चुका है कि इसके हाथ से विपक्ष का नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार खिसक सकता है। हरियाणा में कांग्रेस पार्टी को जो भी सफलता मिली है उसका पूरा श्रेय पूर्व मुख्यमन्त्री श्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को इसलिए देना होगा  क्योंकि उन्हें अपने ऊपर पूरा विश्वास था और यकीन था कि लोग परिवर्तन चाहते हैं।

गौर से देखें तो कल तक की विविध विचारमाला के प्रवाह से समुद्र रूप में समाहित कांग्रेस आज इसमें मिलने वाली नदियों की वापसी की वजह से ‘गहरे ताल’ में परिवर्तित होने लगी है परन्तु ऐसा  एक दिन में नहीं हुआ है बल्कि एक लम्बा सिलसिला चला है जिसमें कांग्रेसी समुद्र से कभी तृणमूल कांग्रेस तो कभी राष्ट्रवादी कांग्रेस और कभी वाईएसआर कांग्रेस निकल कर अपने-अपने उद्गम स्थलों के राज्यों में बहने लगी हैं। इसके समानान्तर ही कांग्रेस के राज्य स्तर के कद्दावर नेताओं ने अपने बूते पर इस गहरे ताल में लहरें पैदा करने का भगीरथ प्रयत्न किया है।

 श्री गहलोत के अलावा ऐसे  नेताओं में श्री कमलनाथ और अब श्री हुड्डा का नाम भी लिया जा सकता है परन्तु महाराष्ट्र में कांग्रेस के ताल में थोड़ा बहुत पानी जो भी भरा है वह श्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस की तेज बही तरंगों की चाल से ही भरा है। एक प्रकार से महाराष्ट्र फिलहाल कांग्रेस पार्टी के लिए नेतृत्वविहीन कहा जा सकता है। अतः बहुत स्पष्ट है कि विपक्षी दलों का नेतृत्व करने का ताज कांग्रेस के सिर कैसे बांधा जा सकता है ? एेसे हालात में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठना वाजिब है कि भाजपा के मजबूत नेतृत्व के विरुद्ध विपक्ष का एेसा चेहरा कौन सा हो सकता है जिसके प्रति लोगों में विश्वास पैदा हो सके। महाराष्ट्र में मतदाताओं के सामने विकल्प के तौर पर शरद पवार थे और हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा। इसके साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि राजनीति का वर्तमान दौर ‘संघीय एकल शक्ति’ के प्रादुर्भाव का दौर है। 

अतः विभिन्न विपक्षी दलों को कोई भी रणनीति बनाने से पहले अपने-अपने नेताओं का कद मापना होगा। फुटकर समस्याओं के तूफान को समेटने से विपक्षी एकता को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता बल्कि वैचारिक ध्रुवीकरण को राष्ट्रवाद के सापेक्ष सशक्त रूप में रखकर ही राजनीति को गतिशील बनाये रखा जा सकता है परन्तु यह कार्य किसी ऊर्जावान नेतृत्व की छाया में ही हो सकता है। श्री शरद यादव ने यह स्वीकार जरूर किया है कि महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनावों ने नया रास्ता दिखाया है मगर इस रास्ते पर चलने के लिए क्या उनके पास ऐसा  कोई विचार है जिससे विपक्षी दल उस पर सरपट दौड़ते हुए अपनी कल की कलह से बाहर आ सकें और विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी अपने अभिजात्यपन की ऐंठ को छोड़कर सड़क की राजनीति करने के लिए तैयार हो सके।