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संसद की सर्वोच्चता का सवाल

स्वतन्त्र भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे कई मौके आये हैं जब सड़कों पर मच रहे कोहराम और कोलाहल की प्रतिध्वनि संसद में इस प्रकार सुनी गई है कि इसकी कार्यवाही पूरे-पूरे सत्र तक नहीं चल सकी। दरअसल यह जीवन्त लोकतन्त्र की निशानी होती है क्योंकि संसद लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों से लोगों के लिए ही बनी होती है। ऐसा इसलिए भी होता है कि संसद की विश्वसनीयता हर प्रकार के सन्देह से परे और मिथ्या प्रचार या अफवाहों से दूर होती है। इसके भीतर संसद का प्रत्येक सदस्य उन विशेषाधिकारों से लैस होता है जो उसे लोकतन्त्र को हर हालत में बुलन्द रखने के लिए मिले होते हैं। ये विशेषाधिकार आम जनता की समस्याओं को संसद में उठाने के लिए इस प्रकार मिले होते हैं कि वह बिना किसी खौफ या खतरे अथवा डर के उनका बेबाकी के साथ उल्लेख कर सके। संसद में प्रकट किये गये उसके विचारों या व्यवहार पर देश की किसी भी अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और उसकी जांच या तसदीक का अधिकार केवल संसद को ही इसके अध्यक्ष के माध्यम से मिला होता है। 

बेशक संसद में सरकारी सत्ता पक्ष और विपक्ष होता है मगर सर्वप्रथम सरकार में शामिल हर मन्त्री संसद का सदस्य होता है और उस पर सदस्यता के नियम लागू होते हैं जो मन्त्री छह महीने तक संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता वह संविधान की शपथ उठा कर ही इस औहदे पर सीमित काल तक बना रह सकता है अतः परोक्ष रूप से वह भी सदन के अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। फिलहाल मोदी मन्त्रिमंडल में एेसा एक भी मन्त्री नहीं है जो दोनों में से किसी एक सदन का सदस्य न हो। अतः सामयिक प्रश्न यह है कि संसद में किसी भी मन्त्री द्वारा दिये गये बयान की तसदीक सदन के भीतर ही उसके नियम कायदों के मुताबिक हो। कोरोना संक्रमण पर उच्च सदन राज्यसभा  में काफी हील-हुज्जत के बाद बहस शुरू हुई जिसमें नये स्वास्थ्य मन्त्री श्री मनसुख मांडविया ने कहा कि देश में आक्सीजन की कमी की वजह से किसी की मृत्यु नहीं हुई। इस पर देश की आम जनता में हैरानी है क्योंकि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हिन्दोस्तान की सड़कों का आलम यह था कि लोग अस्पतालों में भर्ती अपने परिजनों के लिए आक्सीजन के सिलेंडर का इन्तजाम करने के लिए दिन भर लाइनों में लग कर किसी तरह उसे अस्पतालों तक पहुंचाते थे क्योंकि अस्पतालों का प्रबन्धन उनसे कह रहा था कि वे अपने मरीज को किसी दूसरी जगह ले जायें, उनके पास आक्सीजन नहीं है। लगभग हर प्रदेश से ये खबरें आ रही थी कि इनमें स्थित अस्पतालों ने आक्सीजन की कमी की वजह से मरीजों को भर्ती करना बन्द कर दिया है अथवा जो मरीज भर्ती हैं उनके परिजनों से कह दिया है कि वे आक्सीजन का प्रबन्ध खुद करके उन्हें दें। यह हालत हम उस देश में देख रहे थे जिसमें आक्सीजन का उत्पादन पूरी दुनिया में सबसे अधिक होता है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश के सभी टीवी चैनलों पर आक्सीजन की कमी की वजह से मरने वाले लोगों की दुर्दशा पर बहसें भी हो रही थीं। तब यह बात निकल कर आई कि आक्सीजन का वितरण राज्यों को केन्द्र करता है। उस समय एेसे मामले भी सामने आये जब एक राज्य ने अपने यहां स्थित आक्सीजन संयन्त्रों से किसी दूसरे राज्य को आक्सीजन भेजे जाने पर रोक तक लगा दी। आक्सीजन का संकट इतना भयावह बना कि एक राज्य ही दूसरे राज्य से लड़ने लगा। कोरोना की दूसरी लहर ने लाखों लोगों को अपना ग्रास बना डाला। इसका नजारा भी संसद में पेश हुआ जब लोकसभा में इसने थोड़े ही अन्तराल में 40 पूर्व सांसदों की मृत्यु पर श्रद्धांजलि अर्पित की। राज्यसभा में भी वर्तमान व पूर्व सांसदों को दी गई श्रद्धांजलि के दौरान एेसा ही नजारा पेश हुआ। आजादी के बाद से अब तक कभी एेसा नहीं हुआ कि संसद के दो सत्रों के अन्तराल के बीच इतने अधिक सदस्यों को श्रद्धांजलि दी गई हो। अतः कोरोना की विभीषिका की संसद खुद गवाह है।

 जाहिर है कि अस्पतालों की दुर्दशा के चलते जिस प्रकार विभिन्न राज्यों में लोगों की बेहिसाब मृत्यु हुई उसमें आक्सीजन की किल्लत का भी योगदान रहा होगा। अतः यह तर्क देश की आम जनता के गले किस प्रकार उतर सकता है कि आक्सीजन की कमी से किसी नागरिक की मृत्यु नहीं हुई परन्तु स्वास्थ्य मन्त्री मांडविया ने संसद में यह बयान एक तकनीकी आड़ लेकर दिया और कहा कि किसी भी राज्य सरकार ने केन्द्र को यह सूचना नहीं दी कि उसके राज्य में कोरोना काल के दौरान कोई व्यक्ति आक्सीजन की कमी की वजह से मरा, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी जरूर मृत्यु का कारण बताई गई। श्री मांडविया तकनीकी रूप से बेशक दावा कर सकते हैं कि किसी भी राज्य सरकार ने लोगों की मृत्यु की वजह आक्सीजन की किल्लत को नहीं बताया मगर यह हकीकत कैसे नजरंदाज कर सकते हैं कि स्वयं नागरिक ही जगह-जगह विभिन्न शहरों में ‘आक्सीजन लंगर’ लगा रहे थे और मरीजों को मौत से बचा रहे थे। विभिन्न राज्यों की सरकारें अगर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाह रही थी तो यह तथ्य संसद की कार्यवाही में दर्ज होना चाहिए।

सवाल सिर्फ इतना सा है कि संसद से वे तथ्य ही बाहर जाने चाहिए जिनकी सड़कें भी गवाही दे रही हों। इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और राज्य ही जन्म व मृत्यु दर के आंकड़े केन्द्र को सुलभ कराते हैं परन्तु सच को छिपाने का अधिकार तो किसी राज्य के पास भी नहीं है। क्योंकि हमने देखा है कि उत्तर प्रदेश व बिहार में गंगा नदी के तट पर और मध्य प्रदेश में क्षिप्रा नदी के तट पर शवों का क्या नजारा था। यह सब तभी हुआ था जब चारों तरफ आक्सीजन की किल्लत बनी हुई थी और लोग खुद ही एक शहर से दूसरे शहर तक जरूरतमन्दों को आक्सीजन के सिलेंडर पहुंचा रहे थे।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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