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संपादकीय

‘गांव, गरीब और बजट’

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का प्रथम बजट लीक से हट कर रखा गया बजट इस मायने में कहा जायेगा कि इसके माध्यम से सामाजिक बदलाव करने का प्रयास किया गया है। जिस तरह वित्त मन्त्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने ‘गांव-गरीब-किसान’ को केन्द्र में रखने की बात अपने भाषण में कही उससे कुछ आर्थिक विशेषज्ञ मतभेद रख सकते हैं परन्तु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि बजट में बजाये ‘इंडिया’ को केन्द्र में रखने के ‘भारत’ को केन्द्र में रखने का प्रयास किया गया है। अतः भारत की गरीब आबादी को यदि अपने जन-धन बैंक खातों से  पांच हजार रुपये का  ‘ओवर ड्राफ्ट’ प्राप्त करने की सुविधा दी जाती है तो जमीन पर इसका बहुआयामी असर होगा। 

निश्चित रूप से बजट सरकार का आय-व्यय का ही ब्यौरा होता है मगर लोकतन्त्र में सरकारें इसी के माध्यम से सामाजिक बदलाव लाने के प्रयास भी करती हैं और सम्पत्ति में समान बंटवारे के प्रयास जारी रखती हैं। अतः  वित्त मन्त्री ने यदि दो करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक आय करने वालों पर कर की दर बढ़ा कर अपना राजस्व बढ़ाना चाहा है तो इसे सामाजिक बराबरी की तरफ एक कदम के रूप में देखा जायेगा। जाहिर तौर पर पेट्रोल व डीजल पर एक रुपया प्रति लीटर के अधिशुल्क लगाने को जनता पर बोझ बढ़ाने वाला कहा जायेगा किन्तु  इसका उपयोग भारत में आधारभूत ढांचा खड़ा करने पर किये जाने से इसकी उपयोगिता सिद्ध की जा सकती है। 

आगामी पांच वर्षों में  इस मद में 100 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जायेंगे। इस हिसाब से प्रति वर्ष 20 लाख करोड़ रुपये इस मद में खर्च होगा। इससे सतत विकास की गति बनाये रखने में मदद मिलेगी। यदि हिसाब लगाया जाये तो वर्तमान विकास वृद्धि दर को सात प्रतिशत से ऊपर ले जाने के लिए सरकार को  ऐसे प्रयास करने पड़ेंगे जो पारंपरिक विधियों से हट कर हों और इसके लिए सबसे ज्यादा जोर उन्हीं क्षेत्रों पर देना पड़ेगा जिनमें सर्वाधिक रोजगार सृजन की संभावनाएं होती है। अतः कृषि क्षेत्र के लिए यदि ‘एक राष्ट्रीयकृत भंडारण शृंखला’ का निर्माण होता है तो उस ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मजबूती आयेगी जिसका दारोमदार खेती पर ही निर्भर होता है।

 

किसान की आय को केवल उसकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करके ही नहीं बढ़ाया जा सकता है बल्कि उसकी उपज के समुचित संरक्षण से भी बचाया जा सकता है जिससे वह बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के दायरे में इस प्रकार आये कि इसी बाजार की मांग व आपूर्ति के फार्मूले का अपनी ताकत के बूते पर मुकाबला कर सके और यह कार्य कृषि क्षेत्र में पूंजी सृजन के बिना नहीं हो सकता। कृषि को लाभकारी बनाने के लिए ऐसा करना पहली शर्त है लेकिन इसके लिए भी शर्त है कि गांवों को जोड़ते हुए उसका सम्पर्क सीधे मुख्य क्षेत्रों से हो और यह कार्य आधारभूत ढांचे को मजबूत करके ही किया जा सकता है। इस बजट में यह दृष्टि है कि किस तरह केवल शहरों के बाहर भारत के विकास को गति देकर उसकी हिस्सेदारी ‘इंडिया’ में तय की जाये क्योंकि अभी तक यह कहा जाता रहा है कि भारत की कुल राष्ट्रीय सम्पत्ति का 73 प्रतिशत हिस्सा एक प्रतिशत लोगों के कब्जे में है जबकि शेष 27 प्रतिशत में शेष भारत के लोग आते हैं।

अतः मध्यम आय वर्ग के लोगों में से पांच लाख रुपये वार्षिक आय तक की सीमा वाले लोगों को कर देने से अलग करके पैगाम दिया गया है कि सुगमता के साथ जीवन जीने में सरकार उनके साथ है परन्तु इसके साथ ही आयकर के पैन कार्ड के स्थान पर आधार कार्ड नम्बर का प्रयोग करने की छूट देकर सरकार ने यह चेतावनी भी दे दी है कि कर चोरी करने के प्रयासों से आम जनता को बचना चाहिए क्योंकि इस वर्ष से वह पूर्व भरे हुए आयकर फार्म ( फ्री फिल्ड रिटर्न) को भी प्रचलन में ला रही है। इसका मतलब यह होता है कि भारत के लगभग 120 करोड़ लोगों के आधार नम्बर से वह उनकी आय का ब्यौरा निकाल सकती है और उसके अनुसार उनसे आयकर भरने की अपेक्षा कर सकती है। ये सब प्रयास आर्थिक समानता लाने की गरज से सरकार करती है तो इसका विरोध अनुचित कहा जायेगा। क्योंकि बजट में ही सरकार ने फेरी लगा कर सामान बेचने वालों या छोटी- छोटी दुकान चला कर अपना गुजारा करने वालों से लेकर दस्तकारों और फनकारों तक को बुढ़ापे की पेंशन देने की घोषणा की है। 

इन लोगों की राष्ट्रीय सम्पत्ति में हिस्सेदारी तय करना भारत की कल्याणकारी सरकार का पहला कर्त्तव्य बनता है। कृषि क्षेत्र के कल्याण का अर्थ केवल किसानों की कर्ज माफी नहीं होती है बल्कि उन्हें कर्ज न लेने की क्षमता प्रदान करने से होती है  परन्तु इसके साथ ही यह भी जरूरी होता है कि भारत में औद्योगिक गतिविधियों को भी लगातार विस्तार मिलता जाये। इस दिशा में मजबूती लाने के लिए सस्ते सुलभ  ऋण की उपलब्धता मूल शर्त होती है जिसकी वजह से सरकारी बैंकों की पूंजी क्षमता बढ़ाने हेतु सरकार ने 70 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था बजट में की है और टैक्नोलोजी के इस दौर में भारत की इलैक्ट्रानिक कम्पनियों में बने सामान पर शुल्क दर घटाई है तथा आयातित पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता कम करने के लिए बिजली से चलने वाले मोटर वाहनों के उत्पादन पर न्यूनतम शुल्क दर कर दी है। यह नयी पीढ़ी की टैक्नोलोजी की तरफ तेज गति से बढ़ने वाला कदम है। आयात शुल्क की आधार दरों में वृद्धि करके कोशिश की गई है कि भारत में उत्पादित सामान को बढ़ावा दिया जाये किन्तु देश में उत्पादन के लिए जरूरी कुछ आयातित सामान पर शुल्क दरें घटाई भी गई हैं। इस सम्बन्ध में आयातित पुस्तकों पर आयात शुल्क बढ़ाना उचित नहीं कहा जा सकता। 

बजट का मुख्य लक्ष्य उत्पादन गतिविधियों को बढ़ाते हुए ग्रामीण या गरीब भारत का उत्थान इस तरह है कि 2022 तक प्रत्येक भारतीय का अपना घर हो। इसके लिए बजट में प्रधानमन्त्री आवास योजना के तहत घर खरीदने हेतु अनुदान की धनराशि बढ़ा दी गई है। रेलवे बजट को भी अब आम बजट में  समाहित कर दिया गया है। अतः 2030 तक रेलवे में 50 लाख करोड़ रुपये का निवेश करके विभिन्न परियोजनाओं को लागू करने का मन बनाया गया है। किन्तु इस क्षेत्र में निजी-सरकारी सहयोग (पीपीपी)  आधार पर काम होगा। इसके कुछ खतरे भी हैं, उन पर ध्यान देना होगा। साथ ही एयर इंडिया का विनिवेश करने का फैसला भी सरकार ने किया है। नागर विमानन क्षेत्र में हमें विदेशी निवेश के प्रति सतर्कता कभी नहीं छोड़नी चाहिए और उन सार्वजनिक कम्पनियों का संरक्षण मजबूती के साथ करना चाहिए जिनका योगदान भारत के विकास में मूलभूत रूप से रहा है।