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संपादकीय

चल संन्यासी अंदर में...

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भारत में संत शब्द के अर्थ बहुत व्यापक हैं। पवित्रात्मा, परोपकारी, सदाचारी। हिन्दू धर्म में संत उस व्यक्ति को कहते हैं जो सत्य आचरण करता है तथा आत्म ज्ञानी है। इन्हें साधू, संन्यासी, विरक्त या त्यागी पुरुष या महात्मा कहकर सम्बोधित किए जाने की परम्परा है। भारतीय संस्कृति में साधु-संन्यासी को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में भी युधिष्ठिर ने कहा था-महाजनो येन गतः सः पंथा, अर्थात् महापुरुष या मनीषियों के द्वारा दिखाये मार्ग पर चलना चाहिए। पहले व्यक्ति और फिर समाज साधु-संन्यासियों के दिखाए मार्ग पर चलने का अनुसरण करते रहे। 

पहले ऋषि, महात्मा और संन्यासी सब कुछ छोड़कर सत्य की तलाश में जंगल और पर्वतों पर निकल जाते थे। वे हमेशा सत्य और ईश्वर की तलाश में लगे रहते थे और जीवन में सुख प्राप्त करने की कभी उन्होंने इच्छा ही नहीं की लेकिन अब बाबा जंगल और प​र्वतों में नहीं रहते बल्कि समाज में रहकर जीवन का हर सुख प्राप्त करते हैं। संत और सियासत का ऐसा घालमेल हुआ, जिसके चलते संत-महात्मा भी राजनीति में हैं। अब सवाल यह है कि वास्तव में ये संत हैं? एक संत हुए थे कुंभनदास। इनको मुगल दरबार में ले जाने की बड़ी कोशिश की गई, लेकिन वह नहीं गए। तब मुगल राजधानी फतेहपुर सीकरी थी। कुंभनदास ने कहा- ‘‘संतन को कहां सीकरी से काम? आवत जात पनहियां टूटी विसरि गयो हरि नाम।’’ यानी एक संत का राजा के दरबार में क्या काम? 

आने-जाने में जूता भी टूटेगा और राम के भजन में भी विघ्न पड़ेगा। अब कहां वे कुंभनदास और कहां यह स्वामी चिन्मयानंद। समय का खेल देखिये स्वामी चिन्मयानंद जो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में गृह राज्यमंत्री पद पर विराजमान रहे, जिनके आगे-पीछे सुरक्षा कर्मियों की भरमार रहती थी, उसे पुलिस स्वयं गिरफ्तार कर जेल में डालने के लिए आई। स्वामी चिन्मयानंद की गिरफ्तारी तभी हुई जब बलात्कार की शिकार पीड़ित युवती ने आत्महत्या की धमकी दी। सारी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुई। चिन्मयानंद की गिरफ्तारी तो जरूर हुई लेकिन यह बात एक बार फिर उजागर हो गई कि पुलिस तंत्र कमजोर लोगों के लिए अलग और ऊंची शख्सियताें के लिए अलग रुख अपनाता है। 

शाहजहांपुर के लॉ कालेज की छात्रा ने उनके वीडियो सार्वजनिक करते हुए स्वामी चिन्मयानंद पर उसके समेत अन्य कई लड़कियों का यौन शोषण करने और धमकाने का आरोप लगाया था लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस हाथ पर हाथ धरे रही। चिन्मयानंद तीन बार सांसद और केन्द्रीय मंत्री रहे। वह 17 आश्रमों के संचालक हैं। धर्म का लबादा ओढ़कर उन्होंने राजनीतिक सफर का आनंद लिया। निश्चित रूप से राजनीति में उनका वर्चस्व था। लगभग 8 वर्ष पहले उनके आश्रम में काम करने वाली एक युवती ने उनके विरुद्ध यौन शोषण और उत्पीड़न का मुकद्दमा दर्ज कराया था लेकिन राज्य सरकार ने उस मुकद्दमे को वापस ले लिया था। फिलहाल उस मामले में हाईकोर्ट का स्थगनादेश मिला हुआ है। 

इस मामले की चर्चा सोशल मीडिया पर काफी होती रही है। पुलिस प्रशासन चिन्मयानंद की पृष्ठभूमि से परिचित है, सवाल यह है कि आखिर किन वजहों से पुलिस कार्रवाई से हिचक रही थी। जब उसके सामने कोई विकल्प नहीं बचा तो उसने चिन्मयानंद को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। गिरफ्तारी के बाद तुरन्त चिन्मयानंद ने अधिकांश आरोपों को स्वीकार भी कर लिया लेकिन बलात्कार के आरोप को अभी स्वीकार नहीं किया है। उन पर पुलिस ने धारा 376 की जगह धारा 376-सी लगाई जो अपेक्षाकृत कम गम्भीर धारा है। आरोप लगाने वाली छात्रा ने भी इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। दूसरी तरफ पुलिस ने पीड़ित छात्रा के चार दोस्तों को भी फिरौती वसूलने की साजिश रचने के मामले में ​गिरफ्तार ​किया है। पूर्ण सत्य क्या है, यह जांच का विषय है। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि चिन्मयानंद ने कई शिक्षण संस्थाओं का संचालन किया लेकिन संन्यासी होने के बावजूद अपनी पिपासा से मुक्त नहीं हो पाए। उनका नाम भी आसाराम, राम रहीम, नित्यानंद आदि की सूची में शा​मिल हो गया है। संतों का हमारे समाज में उच्चता का स्थान है और वे जहां विराजमान होते हैं, वह जगह कुछ ऊंची बनाई जाती है। इसका अर्थ यह है कि वे संत महंत हैं। उनकी श्रेष्ठता का सम्मान करने के लिए उनको ऊंची जगह दी जाती है। वहीं उनके वस्त्र का जो रंग है, वह भी उनके त्याग का प्रतीक है। अब त्याग के प्रतीक लोग पाखंड का तिलिस्मी संसार रच कर लड़कियों का यौन शोषण करेंगे तो संत समाज की ही छवि धूमिल होगी। ऐसे लोगों ही जगह जेल ही है।

‘‘चल संन्यासी अन्दर में

पाप है तेरे अन्दर में।’’