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छात्र कैम्पस में आक्रोश क्यों?

देशभर के 22 छात्र कैम्पस में इन दिनों आक्रोश देखने को मिल रहा है। यह आक्रोश शिक्षा के मुद्दों पर कम एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर ज्यादा नजर आया। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि को लेकर आंदोलन छेड़ा गया था जो अब सरकार विरोधी आंदोलन का रूप ले चुका है। जामिया मिल्लिया का आंदोलन पुलिस ज्यादतियों के विरोध में चल रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी  काफी असंतोष नजर आ रहा है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के राज्यों के छात्रों में भी आक्रोश है। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि किशोरावस्था में युवक-युवतियां विद्रोह की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं। विद्रोह की भावनाओं में बह कर किसी का वामपंथी या दक्षिणपंथी हो जाना बहुत आसान होता है। युवाओं के आक्रोश को शांत करना और उन्हें सही दिशा देना राजनीतिक दलों का कर्त्तव्य होता है। यह सही है कि देश में कई बड़े छात्र आंदोलन हुए हैं और छात्र आंदोलनों ने कई नेता देश को दिए हैं। छात्र आंदोलनों के पक्षधर कहते हैं कि जब देश के संविधान के मूल चरित्र पर सत्ता आघात कर रही हो तो यह छात्रों का दायित्व है कि वह लोकतंत्र पर हो रहे प्रहार के खिलाफ आंदोलन करें। 

ऐसी स्थिति में छात्र खामोश कैसे रह सकते हैं। इस वर्ग का कहना है कि छात्र जाग चुका है। दूसरा पहलू यह है कि छात्रों को विश्वविद्यालयों में केवल शिक्षा हासिल करनी चाहिए न कि आंदोलनों में भाग लेना चाहिए। कहा जाता है कि किसी भी देश के संस्कारों को समाप्त करना है तो वहां की युवा पीढ़ी को भ्रमित कर दीजिए तो उस देश का मूल चरित्र ही बिगड़ जाएगा। देशभर के सभी विश्वविद्यालयों में जैसा वातावरण दिखाई दे रहा है उसके पीछे शिक्षा व्यवस्था का कारण बहुत कम नजर आ रहा है। 

ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल अपने-अपने राजनीतिक हित साधने के लिए छात्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं।जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय परिसर में जो हिंसा हुई, उससे साफ है कि छात्र आंदोलन पूरी तरह से राजनीतिक है। जामिया मिल्लिया परिसर में प्रवेश कर पुलिस ने प्रदर्शन में शामिल कुछ ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जो इस विश्वविद्यालय के छात्र नहीं हैं। इनमें से तीन हिस्ट्रीशीटर बताए गए हैं। सवाल यह भी उठता है कि ऐसे तत्व किसके कहने पर प्रदर्शन में शामिल हुए। उनका छात्र प्रदर्शन में क्या काम था। जेएनयू में नागरिकता कानून के विरोध में वातावरण बनाने की कोशिश की गई। 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, हैदराबाद उर्दू विश्वविद्यालय में भी हिंसा देखने को मिली। देश के आईआईटी और आईआईएम भी आंदोलन की आग से अछूते नहीं रहे। इन आंदोलनों को राजनीतिक दलों का संरक्षण प्राप्त है। यह भी तथ्य है कि ज्यादातर हिंसा भाजपा शासित राज्यों में ही देखने को ​मिली। उत्तर प्रदेश में तो हिंसा ने 16 लोगों की जान ले ली है। शहरों में जमकर बवाल मचा हुआ है। क्या सरकार और प्रशासन स्थिति को भांपने में नाकामयाब रहा या फिर इसके पीछे कोई षड्यंत्र चल रहा है। 

क्या छात्रों और एक विशेष समुदाय के लोगों को भ्रमित किया गया। छात्रों में क्या वह सोच खत्म हो चुकी है जो सोच मुद्दों का पूर्णतः विश्लेषण करती है और अपनी राय बनाती है। नागरिकता संशोधन कानून उन लोगों के लिए है जो विदेशों से धार्मिक रूप से प्रताड़ित होकर आते हैं, इसमें किसी भारतीय नागरिकों के बारे में कोई बात नहीं कही गई। लेकिन इससे एक विशेष समुदाय के लोगों में आशंका पैदा हो गई। जिसने हिंसा का रूप धारण कर लिया। सरकार और समाज में संवाद की कमी रही। अक्सर देखा गया है कि सत्ता कई बार एक के बाद एक ऐसे कदम उठाती है, जिसके परिणाम के बारे में सोचा नहीं जाता और हड़बड़ी में गड़बड़ी हो जाती है। 

जिस तरह से सत्ताधारी दल ने इन प्रदर्शनों को मुस्लिम प्रदर्शन का रूप देने की कोशिश की, उससे भी मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ। यहां तक पुलिस के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में घुसकर छात्रों से मारपीट करने का प्रश्न है, इसे लेकर भी आक्रोश भड़का है। अगर पुलिस को सूचना मिलती है कि कहीं पर कुछ गलत हो रहा है तो पुलिस का दायित्व है कि वह कानून व्यवस्था को बनाए रखने के ​लिए कुछ करे। ऐसा कोई कानून नहीं है जो पुलिस को किसी भी जगह जाने से रोके, भले ही है वह कोई विश्वविद्यालय कैम्पस क्यों न हो। पुलिस आमतौर पर विश्वविद्यालय कैम्पस में इसलिए नहीं घुसती क्योंकि छात्रों के खिलाफ कोई भी एक्शन उलटा पड़ता है। 

1974 में पुलिस ने बिहार और गुजरात में विश्वविद्यालय कैम्पस में घुसकर प्रदर्शनों को रोका था। तब जयप्रकाश नारायण और अन्य नेताओं ने पुलिस एक्शन का ​विरोध किया था। इसके बाद तत्कालीन इंदिरा गांधी को पूरे देश में भारी राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा था। जामिया में पुलिस एक्शन के बाद पूरे देशभर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन देखने को ​मिल रहे हैं। सरकार नागरिकता कानून को लेकर फैले भ्रम को दूर करने का प्रयास कर रही है लेकिन विश्वविद्यालयों में पनप रही विचारधारा की दिशा कैसे बदली जाए, यह अपने आप में चुनौती है। 

राजनीतिक दलों ने छात्रों को अपनी कठपुतली बना डाला है। नागरिकता कानून को लेकर राष्ट्र व्यापी बहस होनी चाहिए, निरर्थक राजनीतिक सिद्धांतों पर बहस में उलझे रहे तो स्थिति नहीं सुधरेगी। विचार शून्यता की स्थिति से हमें बचना होगा। सुप्रीम कोर्ट  ने भी कह दिया है कि वह नागरिकता कानून की वैधता की जांच करेगी तो फिर अविश्वास का सवाल ही कहां उठता है।