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कश्मीर पर शोर शराबा क्यों?

यह याद रखने वाला इतिहास है कि जम्मू-कश्मीर राज्य से जब हिन्दू पंडितों को बेदखल किया गया था तो नई दिल्ली में केन्द्र की ऐसी सरकार थी जिसे एक तरफ भाजपा का समर्थन प्राप्त था तो दूसरी तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नीत वाम मोर्चे का। यह कांग्रेस तोड़ कर पहले ‘जनमोर्चा’ बने और बाद में ‘जनता दल’ बनी पार्टी की सरकार थी जिसके साथ कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों जैसे द्रमुक, असम गणपरिषद और तेलगू देशम् आदि ने मिल कर ‘राष्ट्रीय मोर्चा’ बनाया था। 2 दिसम्बर, 1989 को जब यह सरकार सत्ता पर बैठी तो जम्मू-कश्मीर में नेशनल कान्फ्रेंस पार्टी के नेता डा. फारूख अब्दुल्ला मुख्यमन्त्री थे। 

इस सरकार की सबसे खास बात यह थी कि इसके गृहमन्त्री मुफ्ती मुहम्मद सईद थे जो जम्मू-कश्मीर से पिछली राजीव गांधी सरकार में पर्यटन मन्त्री भी कुछ वर्ष के लिए रहे थे और उन्होंने नेशनल कान्फ्रेंस में विद्रोह करा कर 1984 में डा. फारूख अब्दुल्ला की सरकार को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उनके बहनोई गुल मोहम्मद शाह को बगावत करने के लिए उकसा कर अवामी नेशनल कान्फ्रेंस पार्टी बनवा कर उनकी सरकार बनवा दी थी। यह सरकार बामुशिकल दो साल भी नहीं चल पाई और पुनः फारूख अब्दुल्ला मुख्यमन्त्री बने तथा 1987 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी फिर बहुमत में आयी।

इसके बाद राज्य में पाक परस्त आतंकवादी घटनाओं में वृद्धि होने लगी और नवम्बर 1989 में लोकसभा चुनाव हुए जो केवल 525 सीटों पर ही हुए थे जिन 18 सीटों पर चुनाव नहीं हुए थे उनमें जम्मू-कश्मीर की छह सीटें भी शामिल थीं। मुफ्ती साहब ने यह चुनाव उत्तर प्रदेश की मुजफ्फरनगर सीट से लड़ा और वह जीते।2 दिसम्बर, 1989 को वी.पी. सिंह सरकार में वह गृहमन्त्री बने मुफ्ती साहब के गृहमन्त्री बनते ही उनकी पुत्री रुबैया का अपहरण कर लिया गया। इसकी एवज में  पांच दुर्दान्त आतंकवादियों की रिहाई मांगी गई और मुफ्ती साहब ने इसे मंजूर करते हुए अपनी पुत्री को पा लिया। दिसम्बर महीने के आखिर तक चले इस घटनाक्रम के बाद 19 जनवरी, 1990 का वह काला दिन आया जब श्रीनगर समेत अन्य जगहों से चुन-चुन कर हिन्दू कश्मीरी पंडितों को पाकिस्तान के इस्लामी जेहादी आतंकवादियों ने अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।

तब केन्द्र ने उसी दिन फारूख अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त करके वहां राज्यपाल शासन लगा दिया। विश्वनाथ प्रताप सरकार के नवम्बर 1990 में गिरने के बाद केन्द्र में चन्द्रशेखर सरकार जनता दल तोड़ कर काबिज हुई जिसे विपक्ष में बैठे तब कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने अपने 200 के लगभग सांसदों का समर्थन दिया। केन्द्र लगातार ढीलमढाली बाहर से दूसरे दलों की बैशाखियों पर टिकी सरकारों से चल रहा था और जम्मू-कश्मीर सुलग रहा था, परन्तु इस पूरे घटनाक्रम को लिखने का उद्देश्य केवल इतना है कि पाठक स्वयं अन्दाजा लगा सकें कि इस राज्य में आतंकवाद लाने के लिए जिम्मेदार कौन लोग रहे हैं? 

वी.पी. सिंह ने एक काम और किया कि 19 जनवरी को ही राज्यपाल पद पर बैठे जनरल कृष्णराव को हटा कर उनके स्थान पर उन जगमोहन को नियुक्त किया जो कभी राजीव गांधी की पसन्द थे क्योंकि जगमोहन इससे पहले 1984 से 1989 तक राज्यपाल रह चुके थे। उनके रहते ही इस राज्य में आतंकवाद फला-फूला था और सरकार तोड़ने की कार्रवाई हुई थी। मगर रही सही कसर 1991 में कांग्रेस के ही प्रधानमन्त्री बने पी.वी. नरसिम्हाराव ने पूरी कर डाली और कश्मीर की अलगाववादी तंजीमों के नेताओं का एक संगठन हुर्रियत कान्फ्रेंस बनवा डाला और राष्ट्रपति शासन 1996 तक चालू रखा।

मुफ्ती साहब ने फिर करवट ली और वह पुनः उस कांग्रेस पार्टी में आ गये जिसे उन्होंने 1987 में छोड़ कर वी.पी. सिंह के जनमोर्चे का दामन थामा था। 1999 में उन्होंने फिर कांग्रेस छोड़ी और अपनी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया। इसके बाद1996 के चुनावों में फिर फारूख अब्दुल्ला आये और उन्होंने भाजपा का दामन थाम कर 1999 में एनडीए का दामन थामा और अपने पुत्र उमर अब्दुल्ला को  वाजपेयी सरकार में शामिल करा दिया और 2002 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ हाथ मिला कर मुफ्ती साहब ने सरकार बनाई। 

छह साल बाद फारूख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस ने यही काम किया और कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बनाई मगर 2015 के चुनावों में बाजी पलट गई और भाजपा व मुफ्ती साहब की पार्टी पीडीपी में दोस्ती के जाम चले और सरकार बन गई तथा मुफ्ती साहब की मृत्यु के बाद उनकी पुत्री महबूबा भाजपा के सहयोग से मुख्यमन्त्री बनीं। इस गठबन्धन को एक राष्ट्रीय प्रयोग कहा गया जो असफल हो गया। मगर इसका लाभ यह हुआ कि भाजपा को इस राज्य की अन्दरूनी राजनीति के सभी दांवपेंचों का भलीभांति ज्ञान हो गया और उसने महबूबा सरकार का बीच में ही दामन छोड़ कर अपना वह राष्ट्रीय एजेंडा लागू किया जिसकी वकालत इस पार्टी के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी किया करते थे और इस राज्य के भारतीय संघ में पूर्णता के साथ एकाकर होने की जमकर पैरोकारी करते थे। 

अतः 5 अगस्त, 2019 को मोदी सरकार ने इस राज्य के लिए बनी अस्थायी धारा 370 को हमेशा के लिए समाप्त करके दो राज्यों में तकसीम कर दिया और ऐलान किया कि जम्मू व कश्मीर अब सीधे केन्द्र के जेरे साया रहेगा और लद्दाख अलग से अर्धराज्य बनेगा, लेकिन इस क्रम में इस राज्य की प्रमुख नेशनल कान्फ्रेंस व पीडीपी समेत अन्य हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं को भी नजरबन्द कर दिया गया। इनकी गिरफ्तारी को बाद में पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट (पीएसए) के तहत बढ़ावा दिया गया है जिसे लेकर केन्द्र सरकार की भारी आलोचना हो रही है।

डा. फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती तीनों ऐसे नेता हैं जो पूर्व में केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टियों भाजपा व कांग्रेस दोनों के ही साथ काम कर चुके हैं। अतः इनकी वफादारी पर शक नहीं किया जा सकता मगर राजनीति पर शक जरूर किया जा सकता है क्योंकि कश्मीर में आतंकवाद को पनपाने में इन दोनों पार्टियों की आपसी खेमेबन्दी भी एक वजह रही है। जहां तक 370 का सवाल है तो दोनों ही पार्टियों के नेताओं का इस पर बहुत तल्ख रवैया रहा है मगर यह गिरफ्तारी का कोई कारण भी नहीं हो सकती क्योंकि सरकारी फैसलों की आलोचना करने का अधिकार भारत के लोकतन्त्र में है। इन पार्टियों के नेताओं का असर भी कश्मीरी अवाम पर न हो यह नहीं माना जा सकता। अतः 370 के मामले के सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन देखते हुए इन नेताओं को भारत के संविधान के प्रति ही अपनी पूरी निष्ठा व्यक्त करते हुए रजामन्दी के लिए राजी होना चाहिए। 

जहां तक अन्य विरोधी दलों का सवाल है तो उन्हें 19 जनवरी, 1990 के दिन ही पूरे देश में व्यापक जनान्दोलन चला कर भारत के मुकुट कहे जाने वाले इस राज्य की एकता के लिए आवाज उठानी चाहिए थी। केन्द्र सरकार यदि इस राज्य में विदेशी राजनयिकों की यात्रा बार-बार करा रही है तो इससे घबराने की क्या बात हो सकती है क्योंकि अपने जेरे साया चलने वाले राज्य की स्थिति के बारे में दुनिया मे फैली गफलत को दूर करना उसका कर्तव्य बनता है। बेशक भारत के राजनीतिज्ञों को भी वहां जहां जाने की इजाजत होनी चाहिए बशर्ते वे धारा 370 को बहाना न बनायें। इस धारा के हटाये जाने के बाद कश्मीरियों को भारत के संविधान में प्रदत्त सभी अधिकारों से लैस भी तो किया गया है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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