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एसवाईएल पर सिर्फ हरियाणा का हक : कुमारी शैलजा

चंडीगढ : सतलुज यमुना लिंक नहर का पानी हरियाणा का हक है और एसवाईएल पर हरियाणा प्रदेश के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाई है। पंजाब के राजनीतिक दलों द्वारा हरियाणा प्रदेश को पानी ना दिए जाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना है।  एसवाईएल के मुद्दे पर प्रदेश काग्रेस व प्रदेशवासियों ने लंबा संघर्ष किया है और अदालतों में लड़ाई लड़ी हैं। हम अपने संवैधानिक अधिकार लेने में पीछे नहीं हटेंगे।  

सभी प्रदेशवासियों का यह सपना हमें हकीकत में तब्दील करना है। अपना अधिकार लेने के लिए हम दृढ संकल्पित हैं, जनता के हितों की लड़ाई हम पूरी मजबूती से लड़ेंगे।  हरियाणा को उसके पानी का अधिकार सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने 1976 को इंदिरा गांधी अवार्ड जारी कर दिलाया था। 

वर्ष 1981 में पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौजूदगी में एसवाईएल के निर्माण का समझौता किया था। वर्ष 1982 में इंदिरा गांधी जी ने पटियाला के गांव कपूरी में नहर का निर्माण का शुभारंभ किया था। चाहे हरियाणा बनाने की बात हो या हरियाणा को पानी का अधिकार देने की बात हो, यह सब इंदिरा गांधी जी की ही देन है। वर्ष 1985 को ऐतिहासिक राजीव लोंगोवाल समझौता हुआ, जिसके तहत इराडी कमीशन का गठन हुआ, उस समय कांग्रेस सरकार ने कमीशन के सामने हरियाणा का पक्ष रखा था कमीशन द्वारा हरियाणा को 3.83 मिलीयन फुट पानी का अधिकार दिया गया।

 कांग्रेस पार्टी ने एसवाईएल के लिए हमेशा लड़ाई लड़ी है, श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने इसका शुभारंभ किया था। हमने इंदिरा अवार्ड, राजीव लोंगोवाल समझौता, इराडी  कमीशन दिया, कांग्रेस सरकार ही सुप्रीम कोर्ट गई थी। हमेशा कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की सरकारों ने एसवाईएल की लड़ाई लड़ी है, जबकि अन्य राजनीतिक दलों ने सिर्फ इस पर राजनीति की है। उस समय की लोकदल और भाजपा ने तो ईराड़ी कमीशन का बायकॉट किया था। 

परंतु बार-बार हरियाणा के हिस्से का पानी मिलने में देरी होती रही, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 को पंजाब को निर्देश दिए कि या तो एक वर्ष में एसवाईएल नहर बनवाए या फिर इसका कार्य केंद्र के हवाले करे। सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2002 और वर्ष 2004 का एसवाईएल का हरियाणा के हक में आया फैसला लागू हो गया। 

 इसके बाद भी जब हरियाणा प्रदेश को उसके हक़ का पानी नहीं मिला तो वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय लिया और एसवाईएल निर्माण की जिम्मेदारी का स्पष्ट आदेश केंद्र सरकार को दिया गया।  वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट में एक और ऐतिहासिक निर्णय में पंजाब सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में एसवाईएल निर्माण के निर्णय को स्थगित करने की अपील की गई थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि एसवाईएल नहर निर्माण के अदालत के निर्णय को हर हालत में लागू किया जाए। वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोनों राज्यों को अपने अधिकारियों की कमेटी बनाकर मामला सुलझाने के निर्देश देने के साथ ही साफ कर दिया गया कि अगर दोनों राज्य आपसी सहमति से नहर का निर्माण नहीं करते हैं तो सुप्रीम कोर्ट खुद नहर का निर्माण कराएगा। एक आकंड़े के मुताबिक हरियाणा में करीब 40 लाख हैक्टयेर कृषि योग्य जमीन है, इसमें 33 प्रतिशत भूमि की सिंचाई नहरी पानी से, 50 प्रतिशत की सिंचाई टयूबवलों के माध्यम से तथा 17 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि की सिंचाई बरसात के पानी से होती है।

 जबकि हरियाणा प्रदेश में 30 लाख हैक्टयेर भूमि के नहरों का जाल बिछा हुआ है। लेकिन पानी नहीं होने से प्रदेश की नहरें सूखी पड़ी रहती है। आज हरियाणा बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहा है। भाजपा सरकार की गलत नीतियो के कारण आज प्रदेश के किसान पर भारी संकट छाया हुआ है। तरह-तरह से किसान पर इस सरकार ने मार मारी है।आज प्रदेश के किसानों को पानी की सख्त आवश्यकता है, एसवाईएल के पानी पर हरियाणा का हक है और इसे हरियाणा लेकर रहेगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से हरियाणा के हक में कई बार फैसला आ चुका है। 

 पानी के लिए कांग्रेस पार्टी और प्रदेशवासियों ने लंबी लड़ाई लड़ी है, उस संघर्ष को व उच्चतम न्यायालय के फैसले को अंजाम तक लाने में कि हरियाणा कांग्रेस अग्रणी भूमिका निभाने का काम करेगी । सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ना मानना सपष्ट तौर पर सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना है। 

आज तक हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल सर्वदलीय बैठक के लिए प्रधानमंत्री मोदी से समय नहीं ले पाए,आखिर क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एसवाईएल के मुद्दे पर हरियाणा प्रदेश के नेताओं को समय नहीं दिया। पंजाब ने अपने सभी दलों की बैठक बुलाई, लेकिन हरियाणा की सरकार सोई हुई है, यह लोग अपने आपसी झगड़ों में ही उलझे हुए हैं इन्हें हरियाणा के हितों की सोचने की कोई फुरसत नहीं है। हरियाणा सरकार तुरंत इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जाए और एसवाईएल का पानी हरियाणा को तुरंत दिलाए और केंद्र सरकार भी इस मामले में अपनी स्थिति सपष्ट करे। 

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की जिम्मेदारी बनती थी की वह हरियाणा को उसके हक का पानी दिलवाए, लेकिन केंद्र सरकार क्यों चुप्पी साधे रही ?

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब-हरियाणा के बीच सतलुज-यमुना लिंक नहर के पानी का बंटवारा करने के लिए केंद्र सरकार को कहा था, केंद्र सरकार ने उसके लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाए? क्या यह सही नहीं है कि प्रधानमंत्री जी ने हरियाणा के दलों को एसवाईएल के मुद्दे उनसे मुलाकात करने का समय नहीं दिया था? इतना समय बीतने के बाद भी प्रदेश सरकार ने आखिर क्यों एसवाईएल का पानी दिलवाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव नहीं बनाया?हरियाणा सरकार स्पष्ट करे कि पिछले तीन सालों से उन्होंने इस मामले में क्या ठोस प्रयास किए?