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अदालत ने नाबालिग के साथ यौन दुर्व्यवहार करने के मामले में व्यक्ति को बरी किया

 महाराष्ट्र में ठाणे की एक अदालत ने शादी का झांसा देकर एक नाबालिग लड़की को अगवा करने और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार करने के आरोप से 36 वर्षीय व्यक्ति को बरी कर दिया है। जिला न्यायाधीश एस बी बहलकर ने पिछले सप्ताह अपने आदेश में कहा कि इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने में विलंब हुआ जबकि यह अत्यिधिक महत्वूर्ण साक्ष्य था और ऐसा कोई चिकित्सीय साक्ष्य नहीं था जिससे यह पता चलता कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ था।


 अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि ठाणे के वाडा तालुक की रहने वाली पीड़िता सात मार्च, 2013 को दसवीं कक्षा की परीक्षा देने गई थी लेकिन वह वापस घर नहीं लौटी। उस समय पीड़िता की उम्र 16 साल थी। उसके परिवार के सदस्यों को बाद में पता चला कि वह आरोपी चेतन कांतीलाल पाटिल के साथ गई है। 


उन्होंने तीन दिन बाद पुलिस से संपर्क किया जब उन्हं पीड़िता और आरोपी मिल गये। पुलिस ने बाद में आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण) और 366-ए (नाबालिग लड़की की खरीद) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के प्रावधान (पोक्सो) अधिनियम के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार कर लिया था। 


न्यायाधीश ने उल्लेख किया कि पीड़ित के पिता ने लड़की के तीन दिनों तक लापता रहने के बाद घर लौटने पर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करायी। न्यायाधीश ने कहा कि थाना दो मील की दूरी पर होने के बावजूद 20 घंटे से अधिक समय तक प्राथमिकी दर्ज नहीं कराये जाने जैसे तथ्य के मद्देनजर साक्ष्य के आधार पर दोषी ठहराना असुरक्षित है। 


न्होंने कहा कि पीड़िता ने अपने बयान में कहा है कि आरोपी उसे विभिन्न स्थानों पर ले गया और उसके साथ यौन संबंध बनाए। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि जांच अधिकारी या एक महिला पुलिस अधिकारी ने पीड़िता का बयान दर्ज नहीं किया। 


यह तो सिर्फ अभियोजन पक्ष के आग्रह पर अदालत के समक्ष उसका बयान दर्ज किया गया। उन्होंने कहा कि किसी चिकित्सा परीक्षण में भी यह सामने नहीं आया कि आरोपी ने उसका यौन उत्पीड़न किया। न्यायाधीश ने कहा कि इस आधार पर सहजता से यह निष्कर्ष निकलता है कि अभियोजन आरोपी को दोषी साबित करने में विफल रहा है।