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मंगलकारी भगवान गणेश की POP से बनी प्रतिमाएं बन सकती हैं मुश्किल का सबब, मूर्तिकार पर की जाएगी कार्रवाई

गणेश चतुर्थी से पहले यह निर्देश दिए गए हैं कि भगवान की प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पैरिस (पी.ओ.पी.) की नहीं बनाई जा सकती है।

भारत में आगामी समय हिन्दू त्योहारों से परिपूर्ण है, जिनमें लोग भगवान की प्रतिमाओं को अपने घरों में स्थापित करते हैं। बता दें कि 10 सितंबर से गणेश चतुर्थी के 11 दिवसीय त्यौहार की शुरुआत होने वाली है और इस मौके पर भगवान गणेश की खूबसूरत प्रतिमाओं की स्थापना होती है। वहीं गणेश चतुर्थी से पहले यह निर्देश दिए गए हैं कि भगवान की प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पैरिस (पी.ओ.पी.) की नहीं बनाई जा सकती है। दरअसल, राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के मद्देनजर इंदौर के मूर्तिकारों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि पीओपी की प्रतिमाएं न बनाएं, अगर ऐसा केाई करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 
मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बैठक बुलाई जिसमें जिला प्रशासन, निगम के अधिकारियों के अलावा मूर्तिकार भी मौजूद रहे। इस बैठक में मूर्तिकारों को बताया गया कि प्लास्टर ऑफ पैरिस (पी.ओ.पी.) की मूर्तियों के निर्माण व विक्रय पर प्रतिबंध तथा जल स्त्रोतों में इनके विसर्जन पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है। अपर कलेक्टर पवन जैन ने कहा कि आने वाले त्यौहार गणेश उत्सव व दुर्गा उत्सव हमारी आस्था के पर्व है तथा इन त्यौहारों को हमें इको फ्रेंडली ढंग से मनाना चाहिये ताकि हमारे महत्वपूर्ण जल स्त्रोतों को प्रदूषण से बचाया जा सके। 
बैठक में क्षेत्रीय अधिकारी मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आर.के. गुप्ता ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशों की जानकारी देते हुए कहा कि मूर्तिकार पी.ओ.पी की मूर्तियां न बनाए व मिट्टी की मूर्तिया बनाई जाएं। उत्सव समाप्ति के पश्चात मूर्तियों का विसर्जन जल स्त्रोतों जैसे नदी, तालाब, झरना इत्यादि में प्रतिबंधित रहेगा। विसर्जन हेतु नगर निगम इन्दौर द्वारा पृथक से विसर्जन कुण्ड बनाये जायेंगे।
गुप्ता द्वारा जानकारी दी गई कि जलीय स्त्रोतों में विसर्जन के कारण भारी मात्रा में जल प्रदूषण होता है। मूर्तिकारों द्वारा मूर्ति बनाने हेतु प्लास्टर ऑफ पेरिस, मिट्टी, घास एवं विभिन्न रंगों जिनमें विशेषकर डाईस, पेन्ट्स व खतरनाक रसायन आदि होते हैं, उसका उपयोग किया जाता है। रासायनिक रंगों एवं पेन्टस में विभिन्न तरह की खतरनाक धातुओं का उपयोग होता है। ऐसी मूर्तियों को जब जल में विसर्जित किया जाता है तब यह पदार्थ जल में घुल जाते है और जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। 
धातुऐं पानी में घुलकर पानी को विषैला बना देती है, जिससे जलीय जीव विशेषकर मछलियों की मौत तक हो जाती है। जल स्त्रोतों के पानी को प्रदूषित होने से बचाने के लिये यह आवश्यक है कि पर्यावर्णीय अनुकूल (इको फ्रेन्डली) सामग्री का उपयोग किया जाये। अपर कलेक्टर पवन जैन द्वारा सभी मूर्तिकारों से आग्रह किया गया कि वे पी.ओ.पी. की मूर्तियों का निर्माण व विक्रय नहीं करें। औचक जांच का कार्य नगर निगम के अधिकारियों द्वारा किया जायेगा। दोषी पाये जाने पर संबंधित दोषी संस्था के विरूद्ध कार्रवाई की जायेगी।

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