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क्या हो पाएगा दिल्ली की फुटबॉल का कायाकल्प

नई दिल्ली : पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से अपनी पहचान बनाने के लिए प्रयासरत दिल्ली की फुटबॉल अब पटरी पर आती नज़र आ रही है। अध्यक्ष शाजी प्रभाकरण की अगुवाई में डीएसए ने पहली कार्यसमिति की बैठक में कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनको अमली जामा पहनाना आसान नहीं होगा, लेकिन युवा पदाधिकारियों को साथ लेकर नये-नवेले अध्यक्ष कहां तक कामयाब हो पाएंगे यह तो वक्त ही बताएगा। डीएसए ने अपनी पहली बैठक मे ऐसा बहुत कुछ करने का दम भरा है जैसा आज तक संभव नहीं हो पाया। मसलन राजधानी के दीनहीन क्लबों को आर्थिक सहायता देना और उनकी माली हालत को सुधारना।

सांस्थानिक फुटबॉल की बर्बादी रोकना, खिलाड़ियों, कोचों और रेफरियों को ऐसी सुविधा और माहौल देना जैसा अब तक संभव नहीं हो पाया। पिछली समितियों ने जिन खास बातों की तरफ ध्यान नहीं दिया उन पर नये खून की नज़र पड़ी है। इसमे दो राय नहीं कि पिछले अध्यक्ष महोदय ने सिर्फ वादे किए और कुछ खास लोगों को ढाल बना कर स्थानीय फुटबॉल को गिरावट की हद तक पहुंचाया। कुछ पूर्व अधिकारी और अवसरवादी ही नई टीम मे घुसपैठ करने में कामयाब रहे हैं। कई चेहरे बदले हैं किंतु कुछ पुराने और अवसरवाद के लिए कुख्यात लोग नये जोश और जुनून को हैरान परेशान करते रहेंगे। देखना यह होगा कि बदलाव का नारा देने वाले बगल मे बैठे पुराने शातिरों से कैसे पार पाते हैं। हालांकि नये पदाधिकारियों ने कई अच्छे कदम उठाने का एलान किया है। जिनमें राष्ट्रीय आयोजनों के लिए पहले से ही पुरुष और महिला कोचों की नियुक्ति करना।

सीजन का संपूर्ण केलेंडर बनाना, खिलाड़ियों और रेफरियों को सुरक्षा, विभिन्न सूत्रों से धन जुटाना और बड़े-छोटे आयोजनों के लिए प्रायोजकों को जोड़ना जैसे फैसले शामिल हैं। यह सब तब ही संभव हो पाएगा जब शाजी और उनकी टीम का जोश बना रहेगा और उसके प्रगतिशील कार्यक्रम को अंदर बाहर से सपोर्ट मिलेगा। सिर्फ नई तकनीक और कोरे नारों से काम नहीं चलने वाला। पुरानी बीमारियों से निपटने का साहस ही दिल्ली की फुटबॉल को नयापन दे सकता है। ध्यान रहे जोश ठंडा नहीं पड़ना चाहिए।

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