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मजबूत भारतीय जवानों के सामने चीन के 'चॉकलेट' सैनिकों का क्यों होता है हौसला ढेर, जानिये खास वजह

चीन के साथ एलएसी पर लगातार चलते आ रहे तनाव के बीच पूर्वी लद्दाख में फिंगर-4 के अलावा ब्लैक टॉप, हेल्मेट और रेकिन ला क्षेत्र के ऊंचाई वाले स्थानों पर नियंत्रण करके भारतीय सेना ने पैंगॉन्ग त्सो झील के आसपास अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। भारत के लिए ये काफी अहम बढ़त है क्योंकि ऊंचाई वाले इलाकों से दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना और उसे जवाब देना आसान हो जाता है। 

चीनी जवानों से बेहतर है भारतीय जवान 

रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर अपनी पहुंच स्थापित करते हुए भारतीय सैनिक फिलहाल अपने विरोधियों के मुकाबले लाभ की स्थिति में हैं। चीनी अब चुशुल-डेमचोक मार्ग का निरीक्षण करने के लिए खुद को संघर्षरत पाएंगे। अगर पहाड़ पर युद्ध की बात करें तो इस मामले में भी भारतीय जवान चीन से बेहतर प्रशिक्षित होते हैं। 

पीएलए से कैसे अलग है भारतीय सेना 

दोनों देशों के सेनाओं के बीच अगर सबसे बड़ा अंतर देखा जाए तो भारतीय सैनिक देशभक्ति से भरे हुए हैं। भारत के युवाओं में सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का भाव सहज तौर पर देखा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों में देशभक्ति या मजबूत साहस की कमी है। वह तो महज एक अनिवार्य भर्ती के तौर पर सेना में प्रवेश करते हैं। यही वजह है कि मानसिक तौर पर भारतीय जवान अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए कहीं अधिक सुदृढ़ और आत्मविश्वास से लबरेज हैं। 

डर के साये में चीन की पीएलए 

सूत्रों का कहना है कि एक वरिष्ठ चीनी अधिकारी ने 30 अगस्त को पैंगॉन्ग झील के दक्षिणी और उत्तरी किनारे पर भारतीय सेना द्वारा कब्जा किए जाने के बाद जवाबी हमले और इसे फिर से हासिल करने से इनकार कर दिया। भारतीय सैनिकों का सामना करने के डर ने तो चीनी सेना की रातों की उड़ा रखी है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने नाटक 'आर्म्स एंड द मैन' में उन सैनिकों के बारे में लिखा, जो महज वेतन और भत्तों के लिए सेना में भर्ती होते हैं और गोलियों का सामना करने से डरते हैं। उन्होंने सेना में भर्ती होने वाले ऐसे जवानों को 'चॉकलेट सैनिक' कहा है।

चीनी सैनिक शॉ की इस थ्योरी से स्पष्ट रूप से मेल खाते दिखते हैं। वे निश्चित रूप से एक लड़ाई की गर्मी में ही पिघल जाएंगे। पीएलए के जनरलों को भी वास्तविकता पता है। चीन ने 1993 और 1996 में सीमा पर हथियारों का उपयोग न करने के समझौते पर हस्ताक्षर करके न केवल भारत का विश्वास भंग किया है, बल्कि उसे मूर्ख बनाने का प्रयास भी किया है। 

हर तरह की स्थिति में मुकाबला करने के लिए प्रशिक्षित भारतीय जवान 

अधिकतर भारतीय सैनिक अपने जन्म से कठिनाइयों को झेलने में पारंगत होते हैं। वे आमतौर पर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और फिर रक्षा बलों में शामिल होने के बाद कड़ी मेहनत से प्रशिक्षित होते हैं। वे कड़ी मेहनत करने के साथ ही बेहतर अनुशासन का भी अनुसरण (फॉलो) करते हैं। 

भारतीय जवानों को पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और गुरिल्ला युद्ध की कला में महारत हासिल होती है। उनमें किसी भी तरह की परिस्थिति से गुजरने का साहस और आत्मविश्वास होता है और वे युद्ध के समय सीना तानकर दुश्मन का सामना करने के लिए तैयार होते हैं। इसके विपरीत, चीनी सैनिक तुलनात्मक रूप से आर्थिक रूप से संपन्न और शहरी परिवारों से आते हैं, जिन्होंने पीएलए में भर्ती होने से पहले एक आरामदायक और शानदार जीवन व्यतीत किया होता है। ऐसे पुरुष युद्ध लड़ने के लायक नहीं होते और खतरनाक परिस्थितियों में टूट जाते हैं या पीछे हट जाते हैं। 

पीएलए में शामिल होना एक मजबूरी 

इसके अलावा पीएलए में भर्ती होने वाले युवाओं की वर्तमान पीढ़ी एक बच्चे के आदर्श नियम (सिंगल चाइल्ड नॉर्म) के युग से आती है। सामान्य रूप से अगर परिवार में एक ही बच्चा है तो उसे अत्यधिक लाड़-प्यार मिलने की संभावना भी बनती है, जिससे वह मजबूत और कड़े स्वभाव से वंचित रह जाते हैं। पीएलए में शामिल होना उनकी एक मजबूरी ही होती है, जिससे कहा जा सकता है कि वह सैनिक तो खुद ही देश सेवा के प्रति अनिच्छुक हैं, जो महज नौकरी के तौर पर अपना समय व्यतीत कर रहे होते हैं। वह तो अपने दिनों को गिन रहे होते हैं कि वह चीन के सशस्त्र बलों को कब छोड़ेंगे। उन्हें इंतजार रहता है कि चार से पांच साल का उनका कार्यकाल पूरा हो जाए, ताकि उन्हें घर जाने की अनुमति मिल जाए।

 

बलिदान देने की भावना 

अपने परिवार से दूर एक दूरदराज के स्थान पर मरने के बारे में सोचने मात्र से ही पीएलए के सैनिकों को पसीने आने लगते हैं। इस तरह से वे उन भारतीय सैनिकों से कैसे मेल खा सकते हैं, जिनकी रगों में देशभक्ति का खून बहता है और जो देश और अपनी रेजिमेंट/बटालियन के लिए अपना जीवन बलिदान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। 

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